महाराष्ट्र के हालिया नगर निगम चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं का बदला हुआ रुख राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। वर्षों से कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना जैसे पारंपरिक बीजेपी विरोधी दलों के साथ खड़ा रहने वाला मुस्लिम वोट बैंक इस बार अलग दिशा में जाता दिखा। चुनाव नतीजों में यह साफ तौर पर सामने आया कि बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं ने AIMIM और ISLAM जैसी मुस्लिम-समर्थित पार्टियों को समर्थन दिया, जिससे राज्य की राजनीति में नए संकेत उभरकर सामने आए हैं।
नगर निगम चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि कई मुस्लिम बहुल वार्डों में AIMIM ने न सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, बल्कि मजबूत जीत भी हासिल की। खासतौर पर मराठवाड़ा, विदर्भ और कुछ शहरी इलाकों में पार्टी का प्रदर्शन चौंकाने वाला रहा। AIMIM की इस सफलता का सीधा असर कांग्रेस, NCP (SP) और शिवसेना (UBT) पर पड़ा, जिन्हें इन क्षेत्रों में भारी नुकसान उठाना पड़ा। कई सीटों पर इन दलों के उम्मीदवार तीसरे या चौथे स्थान पर खिसक गए, जबकि AIMIM ने निर्णायक बढ़त बनाई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव अचानक नहीं है, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से पनप रही नाराजगी और असंतोष है। मुस्लिम मतदाताओं का एक वर्ग मानता है कि पारंपरिक दलों ने उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर अपेक्षित परिणाम नहीं दिए। AIMIM और ISLAM जैसी पार्टियों ने इन्हीं मुद्दों को सीधे तौर पर उठाया और खुद को मुस्लिम समाज की आवाज के रूप में पेश किया, जिसका असर चुनावी नतीजों में साफ दिखा।
इसके अलावा स्थानीय नेतृत्व भी इस बदलाव की बड़ी वजह बना। AIMIM ने जमीनी स्तर पर सक्रिय और स्थानीय स्तर पर पहचाने जाने वाले उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिन्होंने मोहल्लों और वार्डों में लगातार संपर्क बनाए रखा। इससे मतदाताओं के बीच विश्वास बढ़ा और पारंपरिक दलों की पकड़ कमजोर होती चली गई। वहीं ISLAM जैसी नई पार्टियों ने भी सामाजिक और धार्मिक पहचान के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं को चुनावी एजेंडे में शामिल किया।
इस बदले हुए वोटिंग पैटर्न ने राज्य की राजनीति के समीकरणों को भी प्रभावित किया है। एक ओर जहां बीजेपी विरोधी खेमे में बिखराव के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम वोटों का विभाजन भविष्य के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बड़ा असर डाल सकता है। कांग्रेस और एनसीपी जैसे दलों के लिए यह एक चेतावनी मानी जा रही है कि यदि वे अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग की चिंताओं को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो उन्हें और नुकसान झेलना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों ने यह संकेत दे दिया है कि मुस्लिम मतदाता अब सिर्फ परंपरा के आधार पर वोट नहीं कर रहा, बल्कि विकल्प तलाश रहा है। AIMIM और ISLAM का उभार इस बदलते राजनीतिक व्यवहार का प्रतीक बनकर उभरा है, जो आने वाले चुनावों में राज्य और देश की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।
AIMIM का शानदार प्रदर्शन
हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने इस बार महाराष्ट्र में जबरदस्त प्रदर्शन किया है. AIMIM ने 13 नगर निगमों में कुल 126 पार्षद सीटों पर जीत दर्ज की. पिछले निकाय चुनावों में AIMIM को सिर्फ 56 सीटें मिली थीं. यानी इस बार पार्टी को दोगुने से ज्यादा सीटों का फायदा हुआ है
शहरवार AIMIM का प्रदर्शन
| शहर | सीटें |
| छत्रपति संभाजीनगर | 33 |
| मालेगांव | 21 |
| नांदेड़-वाघला | 14-15 |
| अमरावती | 12 |
| धुले | 10 |
| सोलापुर | 8 |
| मुंबई महानगरपालिका (BMC) | 8 |
| नागपुर | 7 |
| अहमदनगर-जालना | 2-2 |
| परभणी-चंद्रपुर | 1-1 |
AIMIM ने इस बार 29 में से 24 नगर निगमों में उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से कई जगह पार्टी दूसरे नंबर पर भी रही. निकाय चुनावों का सबसे चौंकाने वाला नतीजा मालेगांव नगर निगम से सामने आया है.
| मालेगांव नगर निगम के नतीजे | |
| कुल सीटें | 84 |
| निर्विरोध | 1 |
| पार्टी | सीटें |
| ISLAM | 35 |
| समाजवादी पार्टी | 6 |
| AIMIM | 20 |
| शिवसेना | 18 |
| कांग्रेस | 3 |
| बीजेपी | 2 |
| ISLAM+सपा | 41 |
ISLAM-सपा गठबंधन पर एक नजर
इस स्थिति में ISLAMसपा गठबंधन शिवसेना के समर्थन से सत्ता हासिल कर सकता है. हालांकि ओवैसी की पार्टी को भी इस्लाम पार्टी सत्ता हासिल करने के लिए न्योता दे रही है लेकिन एआईएमआईएम का कहना है कि पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक में बात करके फैसला लिया जाएगा.
बात करें मालेगांव की तो यहां मुस्लिम आबादी करीब 78% है. जबकि पूरे महाराष्ट्र में मुस्लिम आबादी लगभग 11.56% है. यहां कांग्रेस, शिवसेना (UBT) और NCP (SP) मजबूत ताकत के रूप में उभरने में नाकाम रहीं. इस्लाम पार्टी और एआईएमआईएम ने इन तीनों पार्टियों के वोट काटे.
एआईएमआईएम ने सिर्फ मालेगांव में नहीं बल्कि शंभाजी नगर, मुम्ब्रा, अहिल्यानगर, नान्देड़, अमरावती सहित 13 मनपा में कांग्रेस, उद्धव, समाजवादी और एनसीपी को चोट पहुंचाई. जीते हुए एआईएमआईएम के उम्मीदवारों का हौसला इतना बुलंद है कि वो पूरे शहर को हरे रंग का करने की बात कर रहे हैं.
मुम्ब्रा को ऐसे ग्रीन कलर मे ऐसे रंगना है
मुम्ब्रा से जीते यूनुस शेख का कहना है, आने वाले 5 साल बाद इलेक्शन में उनको इससे भी बड़ा मुहतोड़ जवाब देना है. पूरे मुम्ब्रा को ऐसे ग्रीन कलर मे ऐसे रंगना है कि बुरी तरह से इनको पछाड़ के भेजना है. हर एक उम्मीदवार 5 साल बाद हमारा होगा क्योंकि इस चुनाव में आप मजलिस की ताकद समझ चुके हैं और ये ताकत हमें अल्लाह ने दी है.
वहीं, उद्धव की पार्टी और कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी ने चुनाव में हिंदू-मुस्लिम कर सांप्रदायिक माहौल बनाया. इसका फायदा एआईएमआईएम जैसी पार्टियों को मिला. बीजेपी और एआईएमआईएम ने मिलकर ये खेल रचा है. हालांकि, बीजेपी इस आरोप को खारिज करते हुए कहती है कि कांग्रेस ने बरसों मुस्लिम वोट का तुष्टिकरण किया. यूबीटी ने भी इस्तेमाल किया. अब मुस्लिम समाज अगर इनसे अलग हो रहा है तो ये हम पर तोहमत लगा रहे हैं. हमारे पास हर वो भारतीय है जो देश को प्यार करता है.
AIMIM के कारण किसे हुआ नुकसान?
कांग्रेस
- मुस्लिम बहुल इलाकों में वोट शेयर में बड़ी गिरावट
- छत्रपति संभाजीनगर, मालेगांव, मुंबई, अमरावती, भिवंडी, धुले जैसे शहरों में सीधा नुकसान
NCP (शरद पवार गुट)
- उत्तरी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में वोट बंटवारा
- परंपरागत मुस्लिम समर्थन कमजोर पड़ा
- शिवसेना (UBT), सपा और MNS को भी नुकसान
- सेक्युलर वोट बैंक का बिखराव
कुल मिलाकर AIMIM और ISLAM के उभरने से विपक्षी दलों को नुकसान हुआ. जबकि कई जगह बीजेपी को अप्रत्यक्ष फायदा मिला. इस तरह महाराष्ट्र के निकाय चुनावों ने यह साफ कर दिया है कि मुस्लिम वोटर अब एकमुश्त बीजेपी विरोध की रणनीति से बाहर निकलकर अपनी पहचान और मुद्दों वाली पार्टियों की ओर बढ़ रहे हैं. आने वाले मेयर चुनाव और भविष्य की विधानसभा राजनीति में AIMIM और ISLAM की भूमिका अब नजरअंदाज करना मुश्किल होगा.















