मुजफ्फरनगर। उर्दू भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब, आपसी भाईचारे, मोहब्बत और साझा सांस्कृतिक विरासत की पहचान है। उर्दू की मिठास और समृद्ध साहित्यिक परंपरा ने हमेशा समाज को जोड़ने का काम किया है। इसके संरक्षण और नई पीढ़ी को इस भाषा से जोड़ने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। ये विचार रविवार को उर्दू डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (यूडीओ), मुजफ्फरनगर की ओर से संधावली बाईपास स्थित राना पब्लिक स्कूल में आयोजित विश्व उर्दू दिवस एवं महान शायर अल्लामा इकबाल के जन्मदिवस समारोह में वक्ताओं ने व्यक्त किए। कार्यक्रम का विषय ‘उर्दू : एक जिंदा और जावेद जबान’ रहा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जामिया हमदर्द, नई दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. शह्रियार ने कहा कि उर्दू भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। इसके विकास के लिए शैक्षणिक संस्थानों, साहित्यकारों और समाज को मिलकर प्रयास करने होंगे। विशिष्ट अतिथि डॉ. अनीस अहमद ने नई पीढ़ी को उर्दू शिक्षा से जोड़ने पर जोर दिया। एएस यूसुफ खान ने कहा कि उर्दू किसी एक वर्ग या समुदाय की भाषा नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान की साझा विरासत है।पूर्व विधायक नूर सलीम राना ने कहा कि भाषा और साहित्य समाज को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। यूडीओ के कन्वीनर तहसीन अली असारवी एवं असद फारूकी ने कहा कि उर्दू उत्तर प्रदेश की द्वितीय राजभाषा है, लेकिन इसके शैक्षणिक विकास और प्रचार-प्रसार के लिए अभी व्यापक प्रयासों की जरूरत है। उर्दू को केवल मुशायरों तक सीमित न रखकर शिक्षा और रोजगार से भी जोड़ना चाहिए।
जिलाध्यक्ष कलीम त्यागी एवं मास्टर नदीम मलिक ने उर्दू को मोहब्बत, तहजीब और इंसानियत की भाषा बताते हुए बच्चों को इससे जोड़ने की अपील की। समारोह में अल्लामा इकबाल की शख्सियत और साहित्यिक योगदान पर भी चर्चा हुई। इस दौरान उर्दू भाषा एवं साहित्य की सेवा करने वाली हस्तियों, शिक्षकों और मेधावी प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में शमीम कस्सार, डॉ. शमीमुल हसन, हाजी सलामत राही, डॉ. सलीम सलमानी, बदरुज्जमां खान, मास्टर इम्तियाज अली, गुलफाम अहमद, मास्टर खलील अहमद, डॉ. फर्रुख हसन, कारी तौहीद और डॉ. मोहम्मद यूसुफ खान सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे। अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों का आभार जताया।















