महिलाओं को घर तक सीमित रखने की सलाह पर छिड़ी बहस, ग्रैंड मुफ्ती के बयान पर उठे सवाल.

तिरुवनंतपुरम। एक तरफ जहां भारतीय महिलाएं आज अंतरिक्ष से लेकर ओलंपिक, रक्षा बलों से लेकर कॉपोर्रेट बोर्डरूम और राजनीति तक हर क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रही हैं। वहीं दूसरी तरफ समाज के कुछ रूढ़िवादी वर्ग उन्हें सुरक्षा के नाम पर चार दीवारों में कैद रखने की वकालत कर रहे हैं। केरलम में ग्रैंड मुफ्ती शेख अबू बकर अहमद द्वारा महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रहने और घरों में सीमित रहने की सलाह ने एक बार फिर स्त्री-स्वतंत्रता और महिला सशक्तिकरण की बहस को तूल दे दिया है। दरअसल, कोच्चि में आयोजित हुब्बुल रसूल सम्मेलन को संबोधित करते हुए ग्रैंड मुफ्ती ने तर्क दिया कि जिस प्रकार सोने के आभूषणों की सुरक्षा और सुंदरता के लिए उन्हें डिब्बे में बंद रखा जाता है, उसी प्रकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र से दूर रहना चाहिए।

सुरक्षा के नाम पर कैद नहीं, बराबरी का हक

मुफ्ती ने चेतावनी दी कि महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में आने से भारी तबाही मच सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी दावा किया कि इस्लाम ने ऐतिहासिक रूप से महिलाओं को अधिकार दिए हैं और उनका यह बयान महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए है। धर्मगुरु के इस बयान को समाजशास्त्रियों, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों द्वारा महिलाओं की प्रगति में बाधा और उन्हें दबाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। किसी भी जीवंत लोकतंत्र और प्रगतिशील समाज में महिलाओं की सुरक्षा का अर्थ उन्हें घर में बंद करना नहीं, बल्कि बाहर की दुनिया को उनके लिए सुरक्षित और अवसरों से पूर्ण बनाना है।

महिलाएं वस्तु नहीं, स्वतंत्र व्यक्तित्व

महिलाओं की तुलना अलमारी में रखे सोने के हार से करना उनकी स्वतंत्र सोच, शैक्षणिक क्षमता और निर्णय लेने की क्षमता को नकारने जैसा है। स्त्री कोई सजावटी वस्तु नहीं, बल्कि समाज के निर्माण की बराबर की भागीदार है। आधुनिक भारत में महिलाएं न केवल देश चला रही हैं, बल्कि अपनी मेहनत और नेतृत्व से समाज में बदलाव ला रही हैं। ऐसे समय में सार्वजनिक जीवन में उनके प्रवेश को विनाश का कारण बताना 21वीं सदी की वास्तविकताओं से आंखें मूंदने जैसा है।

प्रगति बनाम पितृसत्तात्मक सोच

मुफ्ती का यह तर्क कि धर्मगुरुओं को अपने समुदाय को दिशा दिखाने का एकाधिकार है। इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे पारंपरिक ढांचे आज भी स्त्री के चयन और स्वतंत्रता को नियंत्रित करना चाहते हैं। आज की महिला को अपने सम्मान, प्रगति और अधिकारों के लिए किसी संरक्षण के डिब्बे की नहीं, बल्कि खुले आसमान और समान अवसरों की जरूरत है।

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