पंजाब कांग्रेस में खत्म होगी कलह,

चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पंजाब कांग्रेस में जारी गुटबाजी को समाप्त करने के लिए पार्टी हाईकमान ने एक नया रणनीतिक फॉर्मूला तैयार किया है। पार्टी नेतृत्व का मुख्य मकसद प्रदेश संगठन की कमान किसी ऐसे निष्पक्ष और सर्वस्वीकार्य चेहरे को सौंपना है, जो अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के दोनों खेमों को एक साथ साध सके।

हाईकमान का मानना है कि 2027 के चुनावों में उतरने से पहले दोनों गुटों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाना ही पार्टी की जीत की एकमात्र कुंजी है। पंजाब कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने करीब तीन सप्ताह तक राज्य के वरिष्ठ नेताओं, सांसदों, विधायकों और संगठन से जुड़े पदाधिकारियों से अलग-अलग स्तर पर गहन संवाद किया। इस व्यापक मंथन के बाद उन्होंने अपनी अंतरिम रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी को सौंपी।

सूत्रों के अनुसार पायलट की रिपोर्ट में वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के खिलाफ पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष और सभी गुटों को एक मंच पर लाने में आ रही व्यावहारिक चुनौतियों का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, गुटबाजी के चलते संगठन की स्थिति प्रभावित हो रही है, जिससे 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले नेतृत्व परिवर्तन और नए सर्वमान्य चेहरे को कमान सौंपना आवश्यक हो गया है।

संतुलन बनाने की कवायद तेज

पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी के बीच अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के इस्तीफे की पेशकश और पूर्व मंत्री विजय इंदर सिंगला का नाम नए अध्यक्ष के रूप में सामने आने से सियासी हलचल तेज हो गई है। पार्टी हाईकमान का मुख्य मकसद एक ऐसे चेहरे को कमान सौंपना है जो राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी दोनों गुटों को साधकर 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी में संतुलन बना सके।सिंगला को एक हिंदू चेहरे और केंद्रीय नेतृत्व के करीबी के रूप में देखा जा रहा है। हाईकमान का मानना है कि उनका तटस्थ रुख दोनों खेमों के बीच जारी अंदरूनी खींचतान को खत्म कर राज्य इकाई में एकजुटता ला सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, नई दिल्ली में शीर्ष नेताओं की हुई बैठक में इस बात पर सर्वसम्मति बनी है कि जब तक वड़िंग और चन्नी समर्थकों के बीच खींचतान बंद नहीं होगी, तब तक आम आदमी पार्टी और अन्य विरोधी दलों का मुकाबला करना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि संगठन में ऐसे नेतृत्व को प्राथमिकता दी जा रही है जो न केवल दोनों वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव को संतुलित रखे, बल्कि कार्यकर्ताओं में भी एकजुटता का संदेश दे सके।

इन चेहरों पर टिकी हैं निगाहें

दोनों गुटों के बीच समन्वय बैठाने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय इंदल सिंगला का नाम सबसे आगे माना जा रहा है। सिंगला एक हिंदू चेहरा हैं और दोनों ही खेमों के साथ उनके बेहतर रिश्ते रहे हैं।इसके अलावा पूर्व ओलंपियन परगट सिंह, पूर्व अध्यक्ष सुखजिंदर सिंह रंधावा, राणा केपी सिंह और सुखबिंदर सिंह सरकारिया के नाम भी चर्चा में हैं। पार्टी नेतृत्व ऐसे नेता की तलाश में है जो जाट सिख, दलित और हिंदू समुदायों के बीच भी बेहतर सामाजिक और राजनीतिक संतुलन स्थापित कर सके।

एकजुटता ही सबसे बड़ी चुनौती

हाल के दिनों में ‘हर बूथ, कांग्रेस मजबूत’ जैसे सांगठनिक कार्यक्रमों के दौरान वड़िंग और चन्नी समर्थकों के बीच तीखी बयानबाजी और नारेबाजी देखने को मिली थी। भूपेश बघेल और सचिन पायलट के दौरों के बाद भी जब गुटबाजी पूरी तरह शांत नहीं हुई, तब हाईकमान ने नए सिरे से कमान सौंपने का फैसला लिया। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि हाईकमान का नया नेतृत्व 2027 के रण से पहले पंजाब कांग्रेस को एकजुट रख पाने में कितना सफल होता है।

गुटबाजी से पहले भी नुकसान उठा चुकी कांग्रेस

पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी गुटबाजी का इतिहास पुराना रहा है। 2022 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले भी पार्टी में ऐसी ही भीषण खींचतान देखने को मिली थी। 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच लंबे समय तक चले सियासी टकराव के बाद पार्टी ने चुनाव से कुछ महीने पहले अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था।

इसके बाद पार्टी ने चरणजीत सिंह चन्नी को राज्य की कमान सौंपी। हालांकि, 2022 के चुनावों में चन्नी अपनी दोनों सीटों-चमकौर साहिब और भदौड़-से हार गए। इस अंदरूनी कलह का भारी नुकसान पार्टी को उठाना पड़ा और कांग्रेस 2017 की 77 सीटों के मुकाबले सिमटकर महज 18 सीटों पर आ गई।

लाइव विडियो
विज्ञापन
क्रिकेट स्कोर
राशिफल
DELHI Weather
Recent Posts