कर्नाटक का मशहूर मद्दूर वड़ा कैसे बना? 109 साल पुरानी है इसकी कहानी

बेंगलुरु और मैसूर के बीच ट्रेन से सफर करने वालों के लिए मद्दूर वड़े सिर्फ एक नाश्ता नहीं, बल्कि एक यादगार अनुभव है. आज भी, ट्रेन में मद्दूर वड़े की आवाज सुनते ही यात्री दौड़ पड़ते हैं और इसे खाने के लिए खरीद लेते हैं, लेकिन कर्नाटक का ये मशहूर नाश्ता पहली बार किसी बड़े होटल की रसोई में नहीं, बल्कि मांड्या के मद्दूर रेलवे स्टेशन पर बना था.साल 1917 में, रामचंद्र बुधिया नाम के एक व्यक्ति मांड्या जिले के मद्दूर रेलवे स्टेशन पर ‘वेजिटेरियन टिफिन रूम’ नाम से एक रेस्तरां चलाते थे. वे बैंगलोर और मैसूर के बीच चलने वाली ट्रेनों के यात्रियों को इडली, वड़े और पकौड़े सहित कई तरह के नाश्ते बेचा करते थे. एक दिन उन्हें सूचना मिली कि ट्रेन तय समय से पहले स्टेशन पर पहुंच जाएगी.

रामचंद्र बुध्या ने पहली बार बनाए थेवड़े

हालांकि, यात्रियों को बेचने के लिए जो पकौड़े तैयार किए जा रहे थे, वे अभी तक तैयार नहीं थे. यह भी आशंका थी कि अगर ट्रेन रुकने के दौरान यात्रियों को नाश्ता नहीं दिया गया, तो कारोबार में नुकसान जाएगा. तभी रामचंद्र को रसोई में मौजूद सभी सामग्रियों को मिलाकर तुरंत एक नया नाश्ता बनाने का विचार आया. उन्होंने सामान्य पकौड़े बनाने के बजाय, मिश्रण को चपटा करके तेल में तल लिया.

मद्दूर वड़े के नाम से हुआ मशहूर

यह नया नाश्ता, जो झटपट तैयार हो गया, यात्रियों को बहुत पसंद आया. इस तरह, जल्दबाजी में बना यह नाश्ता बाद में मद्दूर वड़े के नाम से मशहूर हो गया. मद्दूर वड़े की खासियत इसे बनाने की विधि में है. आम मेदुवड़े या मसाला वड़े के विपरीत, इसमें उड़द दाल और चना मुख्य सामग्री नहीं होते. ये चावल के आटे, मैदा और रवा से बनता है.इसमें प्याज के छोटे टुकड़े, हरी मिर्च, करी पत्ते, धनिया पत्ते, कसा हुआ नारियल, काजू या मूंगफली, हींग और नमक मिलाया जाता है. इसके बाद छोटी-छोटी लोइयां बनाकर उन्हें चपटा करके गोल आकार दिया जाता है और गर्म तेल में तला जाता है. यह बाहर से कुरकुरा और अंदर से थोड़ा नरम होता है. चाहे इसे नारियल की चटनी के साथ खाया जाए या गर्म कॉफी या चाय के साथ, इसका स्वाद लाजवाब होता है.

मद्दूर वड़े की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई

रामचंद्र के प्रयोगों से लोकप्रिय हुए मद्दूर वड़े की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई. उनके परिवार ने 1948 तक इसे बनाना और बेचना जारी रखा. बाद में, एचडी हेब्बर के परिवार ने इस स्नैक की परंपरा को आगे बढ़ाया और इसके स्वाद और लोकप्रियता को और भी बढ़ाया. साल 2017 में ‘वेजिटेरियन टिफिन रूम’ बंद हो गया. मैसूर के राजपरिवार को भी वड़े का स्वाद पसंद था.ऐसे कई संदर्भ मिलते हैं कि वड़े चांदी की थालियों में महल भेजे जाते थे. बाद में, यह नाश्ता रेलवे स्टेशन से आगे बढ़कर राजमार्ग के किनारे स्थित होटलों, नाश्ते की दुकानों और राज्य के विभिन्न हिस्सों तक फैल गया.

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