सोचिए, जिस समुद्र में हर साल दर्जनों तूफान बनते हैं, वहां इस साल सितंबर का आधे से ज्यादा महीना गुजर गया, लेकिन अब तक एक भी हरिकेन नहीं बना. सुनने में यह खबर राहत देने वाली लग सकती है, क्योंकि हरिकेन यानी समुद्री तूफान अपने साथ तेज हवाएं, भारी बारिश और तबाही लेकर आते हैं. लेकिन, मौसम वैज्ञानिकों के लिए अटलांटिक का यह असामान्य सन्नाटा कई सवाल खड़े कर रहा है.
खास बात यह है कि पिछले करीब 175 साल के रिकॉर्ड में सिर्फ दो साल ऐसे रहे हैं जब अटलांटिक में पूरे साल एक भी हरिकेन दर्ज नहीं हुआ था, ये साल 1907 और 1914 रहे हैं. हालांकि, उस समय आज जैसी सैटेलाइट तकनीक नहीं थी, इसलिए कुछ तूफान रिकॉर्ड से छूटे भी हो सकते हैं. 2026 में अभी सीजन खत्म नहीं हुआ है, लेकिन सितंबर के बीच तक एक भी हरिकेन न बनना अपने आप में असाधारण स्थिति है.
हेरिकन न आने से क्यों है चिंता?
अब इस पर ये सवाल सामने आता है कि अगर अटलांटिक में तूफान नहीं आ रहे तो इसमें बड़ी चिंता की बात क्या है? आम तौर पर हम तूफान को सिर्फ तबाही से जोड़कर देखते हैं, लेकिन समुद्र और वातावरण की प्राकृतिक व्यवस्था में इनकी एक भूमिका भी होती है. हरिकेन समुद्र की ऊपरी गर्म परत के पानी को मिलाने और ठंडे पानी को ऊपर लाने में मदद करते हैं. इनके साथ होने वाली बारिश भी कई इलाकों के पानी के चक्र का हिस्सा होती है.
इस साल अटलांटिक में तूफान क्यों नहीं बन रहे?
- एल नीनो का बड़ा असर: प्रशांत महासागर में इस साल बेहद मजबूत एल नीनो की स्थिति है. इससे ऐसी तेज हवाएं बन रही हैं जो अटलांटिक में बनने वाले तूफानों को विकसित होने से रोक रही हैं.
- सूखी हवा और सहारा की धूल: अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान से आने वाली सूखी हवा और धूल भी कई बार तूफानों के लिए जरूरी नमी को कम कर देती है. इससे बनने वाले सिस्टम मजबूत नहीं हो पाते.
- वातावरण सामान्य से ज्यादा स्थिर: वैज्ञानिकों को इस साल अटलांटिक के वातावरण में असामान्य स्थिरता दिखाई दे रही है. ऐसी स्थिति में गर्म और नम हवा ऊपर उठकर बड़े बादल और तूफानी सिस्टम नहीं बना पाती.
अटलांटिक में तूफान कम क्यों आए?
2024 के अटलांटिक तूफान सीजन में अगस्त से सितंबर की शुरुआत तक असामान्य रूप से कम तूफान बने. रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे पांच प्रमुख कारण रहे. पहला, La Niña के आने में देरी हुई, जिससे तूफान बनने के लिए सही मौसम नहीं बन पाया. दूसरा, अटलांटिक में सहारा रेगिस्तान से आने वाली सूखी हवा और धूल भी ज्यादा रही. इसके अलावा, अफ्रीका से आने वाली मौसम प्रणालियां मजबूत नहीं हो पाईं.
समुद्र के कुछ हिस्सों का तापमान भी सामान्य से कम रहा. ऊपरी हवा में भी ऐसे बदलाव हुए, जिनसे बादल और तूफान आसानी से विकसित नहीं हो सके. हाल के सालों का देखा जाए, तो 2020 में सबसे ज्यादा हरिकेन अटलांटिक में आया था, जिसकी संख्या 20 थी, वहीं साल 2025 में अटलांटिक में 5 हरिकेन आया था. हरिकेन बनने के लिए सिर्फ गर्म समुद्र काफी नहीं होता.
सामान्य स्थिति में नीचे की गर्म और नम हवा ऊपर उठती है. इससे बादल बनते हैं और धीरे-धीरे तूफानी सिस्टम मजबूत हो सकता है. लेकिन, जब ऊपर की हवा भी ज्यादा गर्म हो जाती है तो नीचे और ऊपर की हवा के तापमान में अंतर कम हो जाता है. इससे हवा के ऊपर उठने की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है. नतीजा यह होता है कि बादलों का बड़ा सिस्टम बनने और उसके हरिकेन में बदलने की संभावना कम हो जाती है. 1940 से उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, इस साल यह अंतर दूसरा सबसे कम रहा है.
जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ा हो सकता है यह बदलाव
वैज्ञानिकों के मुताबिक, अटलांटिक के वातावरण में बढ़ती स्थिरता का संबंध धरती के बदलते तापमान से भी हो सकता है. समुद्र गर्म होने से ज्यादा पानी भाप बनकर वातावरण में जाता है. आंधी-तूफान और बादल इस गर्मी और नमी को ऊपर ले जाते हैं. वहां नमी के पानी की बूंदों में बदलने पर गर्मी निकलती है और ऊपरी वायुमंडल गर्म होता है. अगर ऊपरी वायुमंडल निचले हिस्से की तुलना में ज्यादा तेजी से गर्म हो जाए तो वातावरण ज्यादा स्थिर हो सकता है.
हरिकेन विशेषज्ञ माइकल लॉरी ने कहा है कि अपने सबसे बुनियादी स्तर पर, वायुमंडलीय स्थिरता हवा की ऊपर उठने या नीचे जाने की प्रवृत्ति है. मौसम विज्ञानी एंडी हेजल्टन ने भी कहा है कि एक ऐसा मुद्दा बताया जो लगभग 2010 के आसपास से ज्यादा स्पष्ट हो गया है. उन्होंने आगे कहा, ‘अगर समय के साथ यह एक मजबूत बदलाव साबित होता है, तो इसका उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के मार्ग और जोखिम पर असर पड़ सकता है.’
हेरिकन न आने से क्या असर पड़ सकता है?
हरिकेन सिर्फ नुकसान ही नहीं करते, बल्कि प्रकृति के लिए भी जरूरी होते हैं. हरिकेन समुद्र के गर्म पानी को ठंडा करने में मदद करते हैं. अगर हरिकेन कम आएंगे, तो समुद्र का पानी ज्यादा गर्म रह सकता है. इसका असर समुद्री जीवों और मौसम पर पड़ सकता है. अगर समुद्र का पानी ठंडा रहेगा, तो गर्मी भी कम पड़ती है. हरिकेन बारिश भी लाते हैं, जिससे कई जगहों पर पानी की कमी कुछ हद तक पूरी होती है. इस बार कई हिस्सों में बारिश कम हुई है.
अगर बारिश की कमी बनी रही, तो खेती पर असर पड़ सकता है. इससे फसलों की पैदावार घट सकती है और आने वाले समय में अनाज की कमी भी हो सकती है. हालांकि, इसका एक दूसरा असर भी हो सकता है. अक्टूबर में जेट स्ट्रीम ज्यादा मजबूत हो जाती है. ऐसे में अगर तूफान देर से बनते हैं तो उनमें से कुछ के अमेरिका के पूर्वी तट तक पहुंचने के बजाय समुद्र की तरफ मुड़ जाने की संभावना बढ़ सकती है.














