ऐसे लोग जो ऑफिस जाते हैं, वो इस बात से वाकिफ होंगे कि उनका दूसरों की तुलना में सीटिंग टाइम काफी ज्यादा होता है। डॉ. अखिलेश की मानें तो इसके बावजूद ज्यादातर उन लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं जो ये दिखा रहे होते हैं कि कैसे उनकी हड्डियां क्रोनिक मस्कुलोस्केलेटल प्रॉब्लम्स की ओर बढ़ रही हैं।मेरे पास हड्डियों की समस्या से जुड़े जितने भी मरीज आते हैं, उनमें से कई ऐसे होते हैं, जिनकी परेशानी की असली जड़ उनका दफ्तर और काम होता है। सर्वाइकल स्पॉन्डिलोसिस, ऑस्टियोपोरोसिस, लम्बर स्पॉन्डिलोसिस, अकड़न और पोस्चर बैलेंस बिगड़ने की समस्या इन लोगों में सबसे आम होती है। इस स्थिति से बचने के लिए ब्रेक लेना, व्यायाम करना, सही डाइट लेना जैसी चीजें मददगार साबित हो सकती हैं। इसके बारे में विस्तार से आगे समझिए।
कैसे चुपचाप हड्डियों को नुकसान पहुंचाता है ऑफिस
आज के मॉर्डन वर्क कल्चर में ज्यादातर जॉब्स 8 से 10 घंटे की सीटिंग वाले होते हैं। इस दौरान उनका मूवमेंट काफी कम होता है। देर तक बैठे रहने वाली लाइफस्टाइल, खराब पोस्चर, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और वर्कस्टेशन के गलत एर्गोनॉमिक्स मिलकर हड्डियों की मजबूती कम करते हैं और रीढ़ की हड्डी, गर्दन व जोड़ों पर लगातार दबाव बढ़ाते जाते हैं।आमतौर पर लोगों को हल्की अकड़न के साथ इसके लक्षण महसूस होते हैं, लेकिन उसे इग्नोर करना उन्हें भारी पड़ जाता है और लंबे समय तक स्थिति बने रहने पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। इस परिस्थिति में क्रोनिक मस्कुलोस्केलेटल प्रॉब्लम्स जन्म ले सकती हैं, जो फिजिकल और इमोशनल डिस्ट्रेस का कारण बनती हैं।
ऑफिस वर्कर्स को होने वाली सबसे आम बोन प्रॉब्लम्स
सर्वाइकल स्पॉन्डिलोसिस
कंप्यूटर या लैपटॉप स्क्रीन को देखते हुए लंबे समय तक काम करना या मोबाइल स्क्रीन टाइम हाई होना, गर्दन पर दबाव को बढ़ाता है। समय के साथ इससे सर्वाइकल स्पाइन खराब हो सकती है और गर्दन में दर्द,अकड़न के साथ ही सिरदर्द आपको परेशान कर सकते हैं।
लम्बर स्पॉन्डिलोसिस और लोअर बैक में दर्द
लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से पर सबसे ज्यादा दबाव डालता है। वीक कोर मसल्स और खराब पोस्चर इस स्थिति को और बिगाड़ते हैं। ये क्रोनिक बैक पेन को जन्म देता है।
अर्ली ऑस्टियोपोरोसिस रिस्क
सेडेंटरी या सुस्त लाइफस्टाइल, हड्डियों के उस स्टिम्युलेशन को कम कर देती है, जो हेल्दी एंड स्ट्रॉन्ग बोन्स के लिए जरूरी है। लंबे समय तक इस स्थिति के बने रहने से हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। खासकर उन लोगों में जिनमें न्यूट्रिशन लेवल भी खराब हो।
कंधे और जोड़ों में अकड़न
लैपटॉप और कंप्यूटर पर लंबे समय तक काम करने का मतलब है ज्यादा देर तक टाइपिंग और माउस का इस्तेमाल भी करना। इससे कंधे के जोड़ों पर जबरदस्त दबाव पड़ सकता है। जिसके चलते अकड़न, दर्द व चलने-फिरने तक में परेशानी आना शुरू हो सकती है।
पोस्चर बिगड़ना
कितना ही ध्यान रख लिया जाए, लेकिन लॉन्ग सीटिंग और स्क्रीन पर फोकस करते हुए व्यक्ति अमूमन आगे की ओर झुक ही जाता है। इस पोस्चर से रीढ़ की हड्डी का नेचुरल अलाइनमेंट बदल जाता है। ये स्थिति हड्डियों और आस-पास की मसल्स पर दबाव को भी बढ़ा देती है।
बोन्स हेल्दी रखना है तो इन संकेतों को न करें नजरअंदाज
- बार-बार गर्दन या पीठ में दर्द
- ज्यादा देर बैठे रहने के बाद अकड़न
- काम करते समय कंधों में तकलीफ
- फ्लेक्सिबिलिटी में कमी
- झुकने में परेशानी
- हाथों व पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन
- दिन के अंत में दर्द और बढ़ जाना
अगर इन शुरुआती लक्षणों को अनदेखा किया जाए, तो आगे चलकर ये इंटरनल स्ट्रेस चीजों को और बिगाड़ क्रोनिक मस्कुलोस्केलेटल डिसऑर्डर का कारण बन सकता है।
गुड हेबिट्स जो रखेंगे बोन्स का ख्याल
अब ऑफिस का काम तो छूट नहीं सकता है, ऐसे में कुछ बदलाव लाकर हड्डियों को हो सकने वाले नुकसान को रोकने की कोशिश की जा सकती है।
पोस्चर का ध्यान रखें
बैठते समय बैक को सीधा रखें और पोजिशन ऐसे सेट करें कि कंधे रिलेक्स्ड रह सकें और आगे या ऊपर की तरफ न उठे रहें। गर्दन में खिंचाव से बचने के लिए कंप्यूटर स्क्रीन को आई लेवल पर सेट करें।
ब्रेक लें
काम के बीच में हर 30-40 मिनट पर थोड़ा ब्रेक लें। अपनी सीट से खड़े हों, स्ट्रेच करें और शॉर्ट वॉक लें। इस तरह के मूवमेंट से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और रीढ़ की हड्डी के दबाव में भी कमी आती है।
एर्गोनॉमिक वर्कस्टेशन सेटअप
ऐसी कुर्सी का इस्तेमाल करें, जो आपकी बैक और खासतौर पर पीठ के निचले हिस्से को सपोर्ट करे। कीबोर्ड और माउस का प्लेसमेंट ऐसा रखें जिससे कंधों में खिंचाव पैदा न हो।मसल्स मजबूत बनाएं
मसल्स और बोन्स को मजबूत बनाने के लिए रेग्युलर एक्सरसाइज करें। फिजिकल एक्टिविटी मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम को हेल्दी रखने में बड़ी भूमिका निभाती है।
ऑफिस वर्कर्स के लिए सबसे अच्छी बोन एक्सरसाइज
- स्ट्रेचिंग: गर्दन, कंधों और पीठ के लिए
- कोर वर्कआउट्स: रीढ़ की हड्डी के लिए
- रेजिस्टेंस ट्रेनिंग: हड्डियों की डेंसिटी बनाए रखने के लिए
- योग और मोबिलिटी एक्सरसाइज: पोस्चर और फ्लेक्सिबिलिटी को बेहतर बनाने के लिए
- वेट लिफ्ट्स: स्ट्रेंथ बढ़ाने के लिए
- वॉक, जॉगिंग या सीढ़ियां चढ़ना: हड्डियों की मजबूती बढ़ान के लिए।
दिन में कम से कम 30 मिनट अपने लिए निकालें और फिजिकल एक्टिविटी में इन्वेस्ट करें। महज आधे घंटे का व्यायाम भी हड्डियों की सेहत को बनाए रखने और सुधारने में काफी मददगार साबित हो सकता है। मजबूत हड्डियों के लिए डाइट में क्या लें हड्डियों की मजबूती बनाए रखने में न्यूट्रिशन बहुत जरूरी होता है, इसलिए कुछ चीजों को डाइट में शामिल करना और कुछ को बाहर करना जरूरी है।
क्या खाएं:
- कैल्शियम रिच फूड: जैसे दूध, दही, पनीर और हरी पत्तेदार सब्जियां
- विटामिन D फूड या सोर्स: जैसे धूप, अंडे और फोर्टिफाइड फूड
- प्रोटीन रिच फूड: जैसे दालें, नट्स, बीज और लीन मीट
- मैग्नीशियम और फॉस्फोरस रिच फूड: साबुत अनाज और नट्स आदि।
- इसके अलावा हाइड्रेशन के लिए लिक्विड लेना भी अहम है, क्योंकि इससे जोड़ों में चिकनाई और मांसपेशियों की कार्यक्षमता बेहतर होती है।
क्या खाने से बचें:
- प्रोसेस्ड फूड
- कैफीन और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स
- हाई सोडियम फूड
- जंक फूड्स
इन सब चीजों के अलावा पर्याप्त नींद, स्ट्रेस मैनेजमेंट, हेल्दी बॉडी वेट और समय-समय पर टेस्ट करवाते रहना भी बोन हेल्थ को मेनटेन रखने में मदद कर सकता है। अगर किसी व्यक्ति को लगातार दर्द, अकड़न या फिर सुन्नपन महसूस होता रहे, तो उसे देरी किए बगैर मेडिकल एक्सपर्ट की मदद लेनी चाहिए। ज्यादातर मामलों को सही समय पर इलाज शुरू करके और सावधानियां बरतते हुए बिगड़ने से रोका जा सकता है। वहीं गुड, हेल्दी एंड बैलेंस्ड लाइफस्टाइल जीते हुए हड्डियों की सेहत को लंबे समय तक बरकरार रखने में मदद मिल सकती है।















