भारत समेत दुनिया के कई देशों में हर साल जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाया जाता है। इस वर्ष यह खास दिन आज 21 जून 2026 को मनाया जा रहा है।भारतीय संस्कृति में रिश्तों की तुलना अक्सर प्रकृति के तत्वों से की जाती है। यही कारण है कि जब परिवार के मुखिया यानी पिता की बात आती है, तो उन्हें अक्सर ‘बरगद का पेड़’ कहा जाता है। लेकिन आखिर इसके पीछे क्या कारण है? आइए जानते हैं।
‘पिता घर के बरगद होते हैं’-सिर्फ कहावत नहीं, जीवन का दर्शन:
‘पिता घर के बरगद की तरह होते हैं’ यह महज एक कहावत नहीं, बल्कि भारतीय समाज की गहरी सोच और अनुभव का प्रतीक है। फादर्स डे के अवसर पर यह समझना जरूरी है कि धर्म, संस्कृति और व्यवहारिक जीवन में पिता की तुलना बरगद के वृक्ष से क्यों की जाती है और उनका महत्व इतना बड़ा क्यों माना जाता है।
बरगद की तरह पिता देते हैं सुरक्षा और सुकून की छांव
बरगद का पेड़ अपनी विशालता और घनी छाया के लिए जाना जाता है। तेज धूप और कठिन परिस्थितियों में यह राहगीरों को ठंडक और आराम देता है। ठीक उसी तरह पिता भी अपने परिवार के लिए सुरक्षा कवच बनकर खड़े रहते हैं।जीवन की परेशानियां, आर्थिक चुनौतियां और जिम्मेदारियों का बोझ वे स्वयं उठाते हैं, ताकि उनके बच्चों तक केवल सुरक्षा, विश्वास और स्नेह की छांव पहुंचे। यही वजह है कि पिता को बरगद के समान माना जाता है।
धर्मग्रंथों में भी पिता को मिला है सर्वोच्च स्थान:
सनातन धर्म में बरगद के वृक्ष को अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना गया है। मान्यता है कि इसमें त्रिमूर्ति-ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है। इसी कारण इसे ‘अक्षयवट’ भी कहा जाता है, जिसका कभी नाश नहीं होता।ठीक इसी प्रकार धर्मग्रंथों में पिता को भी सर्वोच्च स्थान दिया गया है। शास्त्रों में कहा गया है-
“पिता स्वर्गः, पिता धर्मः, पिता हि परमं तपः।
अर्थात पिता ही स्वर्गहैं, पिता ही धर्म हैं और पिता ही सबसे बड़ा तप हैं।















