ईरान : सरकार बदलने की उठी मांग, सड़कों पर क्यों उतरे लोग?

ईरान में इस समय हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं. देश गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है और इसका सीधा असर सड़कों पर दिख रहा है. ईरान के कई शहरों में 3 दिन से हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं. बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और मुद्रा की भारी गिरावट ने आम लोगों का गुस्सा भड़का दिया है. हालात ऐसे बन गए हैं कि जो प्रदर्शन पहले सिर्फ आर्थिक मांगों तक सीमित थे, अब वे सीधे शासन बदलने की मांग में बदलते जा रहे हैं.इन विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत कुछ हफ्ते पहले हुई, जब ईरान की मुद्रा रियाल टूटकर इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. एक अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 14.2 लाख रियाल हो गई. इसके बाद खाने-पीने की चीजों के दाम तेजी से बढ़ गए और व्यापार करना बेहद मुश्किल हो गया. इसी के विरोध में तेहरान के ग्रैंड बाजार और मोबाइल फोन बाजार के दुकानदारों ने हड़ताल कर दी और अपनी दुकानें बंद कर दीं.

इस बार स्थिति क्यों बदली?

पहले ऐसे प्रदर्शन सिर्फ महंगाई या रोजगार जैसे मुद्दों तक सीमित रहते थे, लेकिन इस बार स्थिति अलग रही. कुछ ही दिनों में आंदोलन तेहरान से निकलकर इस्फहान, शिराज, यज्द और केरमानशाह जैसे बड़े शहरों तक फैल गया. जब विश्वविद्यालयों के छात्र भी दुकानदारों के साथ जुड़ गए, तो आंदोलन पूरी तरह राजनीतिक हो गया. अब लोग तानाशाह को मौत जैसे नारे लगाने लगे.इसके साथ ही ना गाजा, ना लेबनान, मेरी जान सिर्फ ईरान के लिए जैसे नारे भी सुनाई दिए. इससे साफ हो गया कि लोग अपनी आर्थिक परेशानी को सरकार की विदेश नीति से जोड़कर देख रहे हैं.

सरकार से बातचीत भी बेनतीजा रही

सरकार की प्रतिक्रिया ने भी लोगों की नाराजगी कम नहीं की. राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने यूनियनों से बातचीत की बात कही. उन्होंने यह भी माना कि हालात बहुत मुश्किल हैं और सवाल उठाया कि जब बजट के लिए 62% टैक्स बढ़ाने की जरूरत हो और महंगाई 50% के आसपास हो, तो पैसा कहां से आएगा.

दूसरी तरफ सुरक्षा एजेंसियों ने सख्त रुख अपनाया है. पुलिस ने कई जगह आंसू गैस और बल का इस्तेमाल किया है. सरकार ने 18 प्रांतों में दफ्तर और विश्वविद्यालय बंद करने का आदेश भी दिया, जिसे प्रदर्शन रोकने की कोशिश माना जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की ये कोशिशें बहुत देर से की गई हैं. लोगों का भरोसा टूट चुका है. कुछ प्रदर्शनकारियों में पुराने शाह के दौर की याद और उनके बेटे रज़ा पहलवी के समर्थन के नारे भी दिख रहे हैं.

युद्ध की वजह से भी हालात बिगड़े

इस संकट की वजह सिर्फ इकोनॉमिक मिसमैनेजमेंट नहीं है. पिछले साल जून में ईरान की इजरायल और अमेरिका के साथ 12 दिन तक चली जंग ने हालात और खराब कर दिए. इस युद्ध में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए और ईरान के कई परमाणु ठिकानों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने वे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध दोबारा लागू कर दिए, जो करीब दस साल पहले हटाए गए थे. इन प्रतिबंधों से ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा है.

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