इथियोपिया में स्थित करीब 10 हजार साल से शांत पड़े ज्वालामुखी के अचानक फटने के बाद हवा में भारी मात्रा में राख और धुएं का गुबार फैल गया। यह राख का बादल लगभग 14 किलोमीटर ऊंचाई तक पहुंच गया, जिसने कुछ ही घंटों में लाल सागर को पार करते हुए यमन और ओमान का रुख किया। इसके बाद हवा की दिशा बदलने से यह बादल अरब सागर की ओर बढ़ा और भारत के कई हिस्सों में इसकी हल्की से मध्यम स्तरीय मौजूदगी दर्ज की गई।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने बताया कि यह ज्वालामुखीय राख का बादल ऊपरी वायुमंडलीय स्तरों में फैला हुआ है और इसका असर मुख्य रूप से पश्चिमी व दक्षिण-पश्चिमी राज्यों पर दिखाई दे सकता है। IMD के अनुसार, हवा की गति और दिशा के आधार पर राख का यह गुबार अगले 24 से 48 घंटे तक भारतीय आसमान में बना रह सकता है, जिसकी सबसे ज्यादा संभावना पश्चिमी तट पर स्थित राज्यों में है।
मौसम विशेषज्ञों की मानें तो राख के बादल का असर महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और गोवा के कुछ हिस्सों में देखा जा सकता है। इसके अलावा केरल और राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र भी इसकी हल्की चपेट में आ सकते हैं। राख के कारण आसमान में हल्की धुंध, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय लालिमा और उड़ानों की ऊँचाई पर मामूली बदलाव जैसी स्थितियाँ बन सकती हैं। हालांकि इनका असर आम लोगों के स्वास्थ्य पर बहुत अधिक नहीं होगा, क्योंकि यह गुबार जमीन से काफी ऊपर के स्तर पर मौजूद है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह ज्वालामुखीय राख सामान्य धूल या प्रदूषण से अलग होती है। इसमें सिलिका और सूक्ष्म कणों की मात्रा अधिक होती है, जो वायु यातायात के लिए चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं। इसी कारण भारत सहित कई देशों की एयरलाइनों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। फिलहाल भारत में किसी उड़ान पर बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा है, लेकिन IMD और DGCA लगातार स्थिति की निगरानी कर रहे हैं।
IMD की ताज़ा मॉडल रिपोर्ट के अनुसार, हवा का रुख जल्द ही बदल सकता है, जिससे यह बादल उत्तर-पूर्व दिशा की ओर हट जाएगा। अनुमान है कि अगले 1 से 2 दिनों में ज्वालामुखीय राख का असर भारत से धीरे-धीरे कम होने लगेगा।
हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि आम नागरिकों को किसी विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि आसमान में धुंध जैसी स्थिति दिखे या सांस लेने में संवेदनशीलता वाले लोगों को समस्या महसूस हो, तो बाहर जाने पर मास्क पहनना फायदेमंद रहेगा।















