अमेरिकी सीनेट के 100% टैरिफ बिल से भारत को क्या खतरा.

अमेरिकी सीनेट ने रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए एक नया विधेयक आगे बढ़ाया है. इस प्रस्ताव में कहा गया है कि अगर कोई देश रूस के साथ व्यापार करने के लिए अमेरिकी डॉलर की जगह अपनी स्थानीय मुद्रा, जैसे रुपया-रूबल, का इस्तेमाल करता है या अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार करने की कोशिश करता है, तो अमेरिका उस देश से आने वाले सामान पर 100% तक टैरिफ लगा सकता है. हालांकि, यह विधेयक अभी कानून नहीं बना है. इसे लागू होने से पहले अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना जरूरी है. इसके बावजूद इस प्रस्ताव ने भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी है, जिनमें चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान भी शामिल हैं.यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए. इसके जवाब में रूस, चीन, भारत और ब्रिक्स के कई देशों ने आपसी व्यापार में डॉलर की जगह स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाना शुरू किया. अमेरिका इसे डॉलर की वैश्विक ताकत और वित्तीय प्रभाव के लिए चुनौती मानता है. इसलिए वह ऐसे देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की तैयारी कर रहा है जो डॉलर के बजाय दूसरी मुद्रा में रूस से व्यापार कर रहे हैं.

भारत पर सबसे ज्यादा असर क्यों पड़ सकता है?

भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं. इसलिए यह प्रस्ताव भारत के लिए तीन बड़े मोर्चों पर चुनौती बन सकता है

1. रूस से सस्ता कच्चा तेल

यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल खरीदना शुरू किया. आज भारत अपनी जरूरत का लगभग 35 से 40 % कच्चा तेल रूस से आयात करता है. इससे ऊर्जा लागत कम रखने में मदद मिली है. लेकिन अगर अमेरिका इस आधार पर सख्त कदम उठाता है, तो भारत के लिए रूस से तेल खरीदना महंगा पड़ सकता है.

2. रुपया-रूबल पेमेंट सिस्टम

रूस को SWIFT अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली से बाहर किए जाने के बाद भारत और रूस ने वोस्ट्रो अकाउंट के जरिए रुपये और रूबल में भुगतान की व्यवस्था बनाई. अमेरिकी सीनेट का नया प्रस्ताव ऐसे गैर-डॉलर भुगतान तंत्रों को निशाना बनाता है. इससे दोनों देशों के बीच व्यापार प्रभावित हो सकता है.

3. रक्षा सौदे

भारत की सेना के पास मौजूद करीब 60 से 70% सैन्य उपकरण रूसी मूल के हैं. S-400 एयर डिफेंस सिस्टम समेत कई बड़े रक्षा समझौते रूस के साथ हैं. प्रतिबंध कड़े होने पर भुगतान, रखरखाव और भविष्य के रक्षा सौदों में मुश्किलें आ सकती हैं.

4. भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती

भारत के लिए रूस और अमेरिका दोनों ही बेहद अहम साझेदार हैं. अमेरिका के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार करीब 120-130 अरब डॉलर का है, जिसमें भारत 34.41 अरब डॉलर के ट्रेड सरप्लस में है. वहीं रूस के साथ व्यापार करीब 60-65 अरब डॉलर का है, जिसका बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से जुड़ा है.

अगर अमेरिका भारतीय उत्पादों पर 100% टैरिफ लगा देता है, तो भारत के आईटी, फार्मा, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और रत्न-आभूषण जैसे निर्यात क्षेत्रों को बड़ा झटका लग सकता है. भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में महंगा हो जाएगा, जिससे डिमांड घट सकती हैं.

स्ट्रेटेजिक ऑटोनमी की परीक्षा

एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि भारत की स्ट्रेटेजिक ऑटोनमी का भी सवाल है. पहले भी अमेरिका ने रूस से रक्षा खरीद को लेकर CAATSA कानून के तहत भारत पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी थी, लेकिन भारत की रणनीतिक अहमियत को देखते हुए सख्त कदम नहीं उठाए गए. इस बार मामला डॉलर के विकल्प तलाशने की वैश्विक कोशिशों से भी जुड़ा है, इसलिए भारत को ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों के बीच संतुलन बनाना होगा.

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल यह सिर्फ एक प्रस्तावित विधेयक है और इसे कानून बनने में अभी कई चरण बाकी हैं. लेकिन इसने भारत के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि वह रूस से सस्ता तेल खरीदने और अमेरिका के साथ अपने सबसे बड़े निर्यात बाजार, दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाए. आने वाले समय में भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह मॉस्को और वॉशिंगटन, दोनों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कैसे करती है.

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