US सैनिक ने गोद ली ईरानी महिला पर सख्त इमिग्रेशन कानून की मार.

अमेरिका में 52 साल से रह रही एक ईरानी मूल की महिला इन दिनों डिपोर्टेशन (निर्वासन) के खतरे का सामना कर रही है। बचपन में उन्हें एक अमेरिकी सैनिक ने गोद लिया था और वे ईसाई परिवार में पली-बढ़ीं, लेकिन अब उनकी नागरिकता और वीज़ा से जुड़े पुराने कानूनी विवाद सामने आ गए हैं।

क्या है पूरा मामला?

1970 के दशक में एक अमेरिकी सैनिक ने ईरान से एक बच्ची को गोद लेकर अमेरिका लाया था। उस समय गोद लेने की प्रक्रिया तो पूरी कर ली गई, लेकिन अमेरिकी नागरिकता के लिए जरूरी कागज़ी औपचारिकताएँ पूरी तरह नहीं की गईं।
नतीजा यह हुआ कि वह महिला कानूनी रूप से अमेरिकी नागरिक नहीं बन सकीं, भले ही उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अमेरिका में बिताई हो।

अब 52 साल बाद क्यों हो रही कार्रवाई?

अमेरिका में इमिग्रेशन कानूनों को सख्ती से लागू किया जा रहा है।

  • जिन लोगों के पास वैध नागरिकता या स्थायी निवास (ग्रीन कार्ड) के दस्तावेज़ नहीं हैं, उनके मामलों की दोबारा समीक्षा की जा रही है।

  • अगर अतीत में वीज़ा या नागरिकता से जुड़ी प्रक्रिया अधूरी रह गई हो, तो उसे कानूनी आधार पर चुनौती दी जा सकती है।

बताया जा रहा है कि महिला के दस्तावेज़ों में बचपन से ही तकनीकी खामी रही, जो अब सामने आई है। इसी वजह से उन्हें डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

कानूनी पेंच क्या है?

अमेरिका में 2000 में लागू हुए Child Citizenship Act के बाद विदेश में गोद लिए गए बच्चों को स्वतः नागरिकता मिलने का प्रावधान है, लेकिन यह कानून उन लोगों पर लागू नहीं होता जो उस समय 18 वर्ष से अधिक आयु के थे।
संभावना है कि यह महिला उस कानून के दायरे में नहीं आ पाईं, इसलिए उन्हें स्वचालित नागरिकता नहीं मिली।

मानवीय पहलू

  • महिला का कहना है कि वह कभी ईरान वापस नहीं गईं।

  • उन्हें वहां की भाषा, संस्कृति या कोई पारिवारिक संबंध भी नहीं है।

  • वे खुद को पूरी तरह अमेरिकी मानती हैं।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इतने वर्षों तक अमेरिका में रहने और एक अमेरिकी परिवार में पले-बढ़े व्यक्ति को तकनीकी कारणों से डिपोर्ट करना मानवीय नहीं है।

आगे क्या?

अब मामला अदालत में है और उनके वकील मानवीय आधार पर राहत की मांग कर रहे हैं।
यदि अदालत या प्रशासन विशेष छूट नहीं देता, तो उन्हें अपने जन्म देश ईरान भेजा जा सकता है।यह मामला अमेरिका की सख्त इमिग्रेशन नीतियों और अंतरराष्ट्रीय गोद लेने की प्रक्रियाओं में खामियों पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।

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