अमेरिका में H-1B और L-1 वीजा नियमों को कड़ा करने की तैयारी शुरू हो गई है। तीन अमेरिकी सीनेटरों ने नए विधेयक पेश किए हैं, जिनका मकसद इन वीजा कार्यक्रमों की कथित खामियों को दूर करना और अमेरिकी श्रमिकों के हितों की रक्षा करना है। H-1B वीजा का इस्तेमाल मुख्य रूप से आईटी सेक्टर और तकनीकी कंपनियों में विदेशी कर्मचारियों की भर्ती के लिए किया जाता है, वहीं L-1 वीजा के जरिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कर्मचारियों को अमेरिका भेजती हैं।
नए प्रस्तावित नियमों के तहत वीजा आवेदनों की गहन जांच की जाएगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कंपनियां इन वीज़ाओं का दुरुपयोग न करें। अमेरिकी सीनेटरों का कहना है कि कई कंपनियां कम लागत पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं, जिससे स्थानीय अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों पर खतरा बढ़ जाता है। यही कारण है कि अब कंपनियों को यह साबित करना होगा कि वे वीजा धारकों को अमेरिकी श्रमिकों के बराबर या उससे अधिक वेतन दे रही हैं। इसके अलावा, कंपनियों को यह भी दिखाना होगा कि विदेशी कर्मचारी ऐसे विशेष कौशल रखते हैं जो अमेरिकी श्रमिकों के पास उपलब्ध नहीं हैं।
इन नियमों का सबसे बड़ा असर भारत जैसे देशों पर पड़ेगा, जहां से हर साल हजारों आईटी प्रोफेशनल्स अमेरिका जाते हैं। भारत दुनिया भर में H-1B वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी देश है। ऐसे में नए नियम लागू होने पर भारतीय आईटी सेक्टर और तकनीकी पेशेवरों को झटका लग सकता है। वहीं, अमेरिका में काम कर रहे हजारों भारतीयों का भविष्य भी प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है, तो भारतीय कंपनियों को अमेरिका में अपने बिजनेस मॉडल में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर आईटी सेवाओं की सप्लाई चेन भी प्रभावित हो सकती है।
किन देशों पर पड़ेगा असर?
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भारत (H-1B वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी)
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चीन (तकनीकी और विनिर्माण क्षेत्र से बड़ी संख्या में कर्मचारी भेजता है)
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फिलिपींस (बीपीओ और सेवा क्षेत्र से जुड़े प्रोफेशनल्स)
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साउथ कोरिया और जापान (तकनीकी कंपनियों के कर्मचारी)
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मैक्सिको और कनाडा (L-1 वीजा के जरिए कॉर्पोरेट ट्रांसफर)















