जातिगत जनगणना की मांग और उस पर होने वाली संभावित कार्रवाई ने देश में सामाजिक समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब तक इस मुद्दे पर ब्राह्मण, ठाकुर जैसे सवर्ण वर्गों की चिंता ज्यादा सुनी जाती थी, लेकिन सैय्यद और पठान जैसे मुस्लिम उच्चवर्ण भी इससे अछूते नहीं हैं। इन वर्गों की आबादी मुस्लिम समुदाय में कम मानी जाती है, जबकि सरकारी योजनाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पिछड़े मुसलमानों को प्राथमिकता मिलती रही है। अगर जातिगत जनगणना में मुसलमानों की जातियों का भी खुलासा हुआ, तो संभव है कि सैय्यद और पठान वर्ग खुद को राजनीतिक रूप से हाशिए पर महसूस करें, जैसे सवर्ण हिन्दू वर्गों में चिंता देखी जा रही है। इससे मुस्लिम समाज में भी नई तरह की वर्गीय पहचान और मांगें उभर सकती हैं। ओबीसी मुस्लिमों की संख्या अधिक होने पर उन्हें अधिक प्रतिनिधित्व और लाभ मिलने की संभावनाएं होंगी, जिससे सामाजिक और राजनीतिक संतुलन बदल सकता है। इसलिए जातिगत जनगणना अब सिर्फ हिन्दू समाज की नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के अंदरूनी ढांचे को भी गहराई से प्रभावित करने वाली प्रक्रिया बन गई है। इस मुद्दे पर सभी वर्गों में गंभीर मंथन शुरू हो गया है।























































