महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का ऐलान भले ही अभी न हुआ हो, लेकन राजनीतिक समीकरण सेट किए जाने लगे हैं. बीजेपी अपने सहयोगी सीएम एकनाथ शिंदे और डिप्टी सीएम अजीत पवार के साथ मिलकर सरकार पर अपना दबदबा बनाए रखने की लड़ाई लड़ रही है तो विपक्षी गठबंधन सत्ता में वापसी के लिए बेताब है. ऐसे में शरद पवार ने चुनाव से पहले मुस्लिम वोटों को साधने के लिए मशक्कत शुरू कर दी है, जिसके लिए बुधवार को अल्पसंख्यक नेताओं के साथ बैठक की. इस दौरान उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लिए सिर्फ वादे ही नहीं किए बल्कि 2024 में बीजेपी को हराने का श्रेय भी दिया.
एनसीपी (एस) के प्रमुख शरद पवार ने पार्टी के अल्पसंख्यक विभाग के साथ राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक मुंबई में की. इस दौरान शरद पवार ने मु्स्लिम नेताओं के साथ वक्फ बोर्ड की जमीन का मुद्दा, आरक्षण समेत कई और मसलों को लेकर बातचीत की. शरद पवार ने मुस्लिमों को आबादी के लिहाज से चुनाव में टिकट देने की भी वकालत की. उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के हर अल्पसंख्यक गांव में लोगों ने बढ़ चढ़कर 2024 के लोकसभा चुनाव में वोटिंग कर के 400 सीटों की बात करने वालों को हराने का काम किया.
अल्पसंख्यकों के हितों का ध्यान रखने का वादा
शरद पवार ने कहा कि एनसीपी (एस) इस बात की गारंटी देती है कि अल्पसंख्यकों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा. कांग्रेस हो या शिवसेना (यूबीटी) मुस्लिमों की पूरी तरह से मदद लेने की तैयारी इन सभी राजनैतिक दलों ने ली है. विधानसभा हो या दूसरे चुनाव सभी में मुसलमान को आरक्षण देना चाहिए. चुनाव में मुसलमान ही यह तय करते हैं कि किसकी जीत और किसकी हार होगी. लोकसभा चुनाव में हुए बदलाव के पीछे भी मुसलमानों का ही हाथ है
महाराष्ट्र में 12 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जो किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. उत्तरी कोंकण, खानदेश, मराठवाड़ा मुंबई और पश्चिमी विदर्भ में मुसलमानों की संख्या अधिक है. महाराष्ट्र की 48 लोकसभा में से 4 सीटों पर 20 से 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता राजनीतिक तौर पर निर्णायक स्थिति में हैं. इसके अलावा 7 सीटें ऐसी भी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता 15 से 20 फीसदी हैं. इसके अलावा मुस्लिम 15 फीसदी वाली 11 सीटें हैं.
मुस्लिम मतदाता राज्य में करीब 45 विधानसभा क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसमें मुंबई इलाके की भी सीटें शामिल हैं. 2019 के चुनाव में 10 मुस्लिम विधायक महाराष्ट्र में चुनकर आए थे, जिनमें से 3 कांग्रेस, 2 एनसीपी, 2 सपा, 2 एआईएमआईएम और 1 शिवसेना का विधायक भी शामिल है. चुनावी रिकॉर्ड बताता है कि 2019 विधानसभा चुनाव में रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियों ने 20 मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था, जिसमें से 10 चुनाव जीते थे. इस हिसाब से मुस्लिम उम्मीदवारों का 50 फीसदी विनिंग स्ट्राइक रेट रहा है.
कांग्रेस ने दिया था महाराष्ट्र को पहला मुस्लिम सीएम
कांग्रेस ने ही 9 जून 1980 को महाराष्ट्र का पहला और इकलौता मुस्लिम मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले के रूप में दिया था. मौजूदा शिंदे-बीजेपी की सरकार में सिर्फ एक मुस्लिम कैबिनेट में भी है, जबकि उद्धव सरकार में चार मंत्री थे. कांग्रेस और एनसीपी को मुस्लिम मतदाताओं के लिए स्वाभाविक पसंद माना जाता रहा है. मुस्लिम बीजेपी के परंपरागत वोटर नहीं रहे हैं. भले ही मुसलमानों ने परंपरागत रूप से कांग्रेस-एनसीपी को वोट दिए हैं. उद्धव ठाकरे के बीजेपी से अलग होकर विपक्षी गठबंधन में आने के चलते मुस्लिमों का विश्वास बढ़ा है.
हालांकि, मुस्लिम समुदाय कांग्रेस-बीजेपी-एनसीपी से खुद को अलग करने की कोशिश भी कर रहा है. कांग्रेस-एनसीपी के साथ राजनीतिक असंतोष और मोहभंग की बढ़ती भावना की वजह से मुस्लिमों को आगामी चुनावों में राजनीतिक विकल्प के रूप में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन, वंचित बहुजन अघाड़ी और समाजवादी पार्टी की ओर झुकते देखा गया है. इसी का नतीजा है कि 2019 में सपा से दो और ओवैसी की पार्टी से दो मुस्लिम विधायक चुनाव जीते थे.
महाराष्ट्र की सियासत में मुस्लिम विधायकों की संख्या कम होती जा रही है, यह इस समुदाय के लिए बड़ा मुद्दा है. 1990 के बाद से मुस्लिम उम्मीदवार को तभी टिकट दिया जाता है जब वह मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र से खड़ा होता है. 1962 में 11, 1967 में 9, 1972 में 13, 1978 में 11, 1980 में 13. 1985 में 10, 1990 में 7, 1995 में 8, 1993 में 13, 2004 में 11, 2009 में 11, 2014 में 9 और 2019 में 10 मुस्लिम विधायक जीतने में सफल है. 2019 के विधानसभा चुनावों में 10 मुस्लिम विधायकों में सें 9 मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों जीते थे.
ओवैसी की महाराष्ट्र की सियासत में एंट्री से पहले सब से ज्यादा मुसलमानों को चुनावी मैदान में उतारने का काम भी कांग्रेस पार्टी ही करती थी. पृथ्वीराज चव्हाण की सरकार में ही मुसलमानों को शिक्षा के लिए 5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन कानूनी पेच में उलझ गया. कांग्रेस ने ही 9 जून 1980 को महाराष्ट्र का पहला और इकलौता मुस्लिम मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले के रूप में दिया था, लेकिन अब कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना (यूबीटी), सपा और AIMIM को मुस्लिम वोट मिल सकता है.
शिवसेना और NCP की नजर मुस्लिम वोट बैंक पर
बीजेपी के साथ मिलकर राज्य में सरकार चला रहे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और एनसीपी प्रमुख अजीत पवार अपने कोटे से मुस्लिम को उम्मीदवार उतार सकते हैं. शिवसेना और एनसीपी की नजर मुस्लिम वोटबैंक पर है. बीजेपी भले ही किसी मुस्लिम को टिकट न दे, लेकिन शिंदे और अजीत पवार जरूर अपने कोटे से उतारेंगे. इस तरह से मुस्लिम वोटों को अपने साथ जोड़ने के लिए अजीत पवार ने भी मुस्लिम समुदाय के लोगों से मुलाकात किया था. शिंदे भी मुस्लिमों को साधने की कवायद में है. ऐसे में मुस्लिम वोटों को लेकर इस बार महा विकास अघाड़ी और महायुति में शह-मात का खेल होना है.















