LGBTQ समाज का हिस्सा लेकिन समलैंगिक विवाह नहीं: मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि LGBTQ समुदाय समाज का एक अहम हिस्सा है, लेकिन अभी शादी की व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे अनचाहे दुष्प्रभाव हो सकते हैं. हालांकि, उन्होंने कहा कि समलैंगिक जोड़ों के लिए एक अलग कानूनी ढांचा हो सकता है. मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान समलैंगिक विवाह पर आरएसएस के विचारों के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि कानून समाज को तय नहीं करता, समाज कानूनों को तय करता है, और समाज को पहले बदलाव के लिए तैयार होना चाहिए.मोहन भागवत ने कहा कि कुछ साल पहले जब मैं आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर से मिला था उस वक्त देश में समलैंगिक की बहस काफी तेज थी. 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को असंवैधानिक नहीं माना था. श्रीश्री रविशंकर और कई अन्य का मानना था कि भारतीय संस्कृति में सेम-सेक्स रिलेशनशिप कोई नई बात नहीं. उनका कहना था कि सबरीमला के भगवान अयप्पन भी मोहिनी अवतार में हरि और हर (शिव) से उत्पन्न हुए थे.

LGBTQ भी हमारी सोसाइटी का हिस्सा

समलैंगिक विवाह पर आरएसएस प्रमुख की बात बेहद अहम है. मोहन भागवत ने कहा कि LGBTQ भी हमारी सोसाइटी का हिस्सा हैं. वे सिस्टम से जुड़े हैं. हालांकि, शादी एक अलग मसला है. यह एक संस्था है, जो परिवार के लिए बनी है. अगली पीढ़ी को फैमिली के बारे में समझना होगा. माता-पिता, दोनों जरूरी अंग हैं. यह सदियों से चला आ रहा है. अब अगर चल रहे सिस्टम को छेड़ा जाए, तो दिक्कत पैदा हो जाएगी. अगर आप नया सिस्टम ला रहे हैं, तो पहले सोसाइटी को उसके लिए तैयार करना होगा. इस पूरे बयान में मोहन भागवत ने इस मुद्दे को तीन हिस्सों में रखने की कोशिश की.Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender और Queer… सच है कि इनसे जुड़ी बातें भारत की सभ्यता में हज़ारों साल से हैं. आरएसएस भी इन्हें हमारे समाज के अंदर से ही मानता है. भारतीय ग्रंथों में भी जिक्र आता है कि हजारों साल पहले भी समाज सिर्फ पुरुष और स्त्री में नहीं बंटा था. महर्षि वात्स्यायन के ग्रंथ कामसूत्र के द्वितीय अधिकरण यानी साम्प्रदायिकीयम् के नौवें अध्याय में स्त्री और पुरुष के अलावा ‘तृतीय प्रकृति’ (या तीसरे स्वभाव) के बारे में विस्तार से लिखा गया है.उन्होंने कहा कि इसे ना तो किसी तरह का विकार माना गया न ही पाप समझा गया. इस थर्ड जेंडर को जन्मजात स्वभाव और प्रवृत्ति माना गया. यानी ये प्रकृति भारतीय समाज में बेहद पुरानी और स्वीकार्य रही है. महाभारत में तो अर्जुन को अज्ञातवास में बृहन्नला बन कर रहना पड़ा था. आरएसएस समाज के इस हिस्से को ना तो अलग मानता है और न ही इसे कमतर मानता है.

समलैंगिक विवाह बिल्कुल अलग बात

मोहन भागवत ने कहा कि भारतीय समाज में समलैंगिक विवाह बिल्कुल अलग बात है. ये LGBTQ जैसी बात नहीं है जो समाज में रहती आई हो. इस तरह के विवाह का भी कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता. बता दें कि मोहन भागवत पहले भी कह चुके हैं कि शादियां एक तरह सोशल कॉन्ट्रैक्ट होती हैं. इस सोशल कॉन्ट्रैक्ट में भूमिकाएं भी बंटी होती हैं.संघ की नजर में समलैंगिक विवाह में ये कॉन्ट्रैक्ट लागू ही नहीं हो पाएगा क्योंकि समान भूमिकाओं (प्रकृति) के लोग अपनी जिम्मेदारियों को आखिर कब तक निबाह पाएंगे. आरएसएस इस तरह की शादियों के खिलाफ रहा है. और ये शादियां भारत में कानूनी वैधता पाने का इंतजार भी कर रही हैं. दुनिया के 38 देशों में समलैंगिक विवाह को मान्यता मिली है.भारत की सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में पाया था कि मौजूदा कानूनों के अनुसार इस तरह के विवाह को मान्यता नहीं दी जा सकती. इन्हें मान्यता प्रदान करने का कानून संसद या विधानसभाओं से पारित होना होगा. फिलहाल तो ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा.

समाज को तैयार करना होगा

इंसानों की प्रकृति तो जन्मजात हो सकती है लेकिन सामाजिक रिश्ते मान्यताओं के मुताबिक बनते हैं. हिंदू मान्यताओं में 8 तरह के विवाह माने गए हैं. इनमें से 4 ही स्वीकार्य हैं. ब्रह्म विवाह सबसे श्रेष्ठ और आदर्श विवाह माना गया है. जिसमें पिता योग्य वर को खुद आमंत्रित कर सत्कार के साथ अपनी पुत्री का विवाह करता है.दैव विवाह में यज्ञ कराने वाले पुरोहित या ऋत्विज को, यज्ञ की दक्षिणा के तौर आभूषणों से सजा कर कन्यादान किया जाता है. आर्ष विवाह में कन्या के पिता को वर धर्म कार्य के लिए एक या दो जोड़ी गाय और बैल मिलते हैं, जिसके बाद विवाह संपन्न होता है. प्रजापत्य विवाह में वर और वधू दोनों की सहमति होती है और पिता यह कहते हुए कन्यादान करता है कि तुम दोनों मिलकर धर्म का पालन करो.

हिंदू सभ्यता नहीं मानती

इन स्वीकार्य या अस्वीकार्य विवाहों में कहीं भी स्वलिंग विवाह का ना तो जिक्र है और ना ही मान्य-अमान्य की बात है. इसीलिए हजारों साल पुरानी होने का बावजूद हिंदू सभ्यता इसे मानती नहीं है. विवाह जितना मान्यताओं की रस्म है, उतनी ही समाज के संतुलन की भी. आरएसएस को लगता है कि भारतीय समाज अभी इस संतुलन से हटने के लिए तैयार नहीं है.मोहन भागवत का संवाद आरएसएस के बाकी संवादों से बिल्कुल अलग था. जेन जेड वो पीढ़ी है जो आंख खुलते ही इंटरनेट और केबल/डिश टीवी के माध्यम से दुनिया की तमाम संस्कृतियों से जुड़ी है. वो देखती आ रही है कि अलग-अलग देशों में क्या होता है, कैसे होता है, उसे ये नहीं पता है कि आखिर जो हो रहा है उसका बैकग्राउंड क्या है. भागवत ने कोशिश की है इस संवाद-निर्वात को भरा जाए. ताकि जेन-जेड को तो समझा ही जा सके. उसे आरएसएस के बारे में भी समझाया जा सके.

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