H-1B वीजा पर नया विवाद: अमेरिकी अर्थशास्त्री ने भारत पर लगाया बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी का आरोप.

अमेरिका के लोकप्रिय H-1B वीजा प्रोग्राम को लेकर एक नया और गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी अर्थशास्त्री और पूर्व सांसद डेव ब्रैट ने दावा किया है कि यह पूरी प्रणाली इंडस्ट्रियल-लेवल फ्रॉड का शिकार हो चुकी है। उनका कहना है कि भारत के तमिलनाडु राज्य के चेन्नई जिले ने ही कथित रूप से 2.2 लाख H-1B वीजा हासिल किए हैं, जबकि अमेरिकी सरकार हर साल पूरी दुनिया के लिए सिर्फ 85,000 वीजा जारी करती है। इस दावे ने पूरे राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में खलबली मचा दी है। ब्रैट का आरोप है कि यह आंकड़ा किसी बड़े पैमाने की हेराफेरी की ओर इशारा करता है और यदि यह सही है तो यह अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

डेव ब्रैट का कहना है कि टेक कंपनियां, रिक्रूटमेंट फर्म और कुछ विदेशी एजेंसियां मिलकर वीजा सिस्टम का दुरुपयोग कर रही हैं। उनका दावा है कि कई कंपनियां एक ही कर्मचारी के लिए अलग-अलग नामों से या कई शेल कंपनियों के जरिए H-1B आवेदन दाखिल करती हैं, ताकि लॉटरी सिस्टम में चयन की संभावना बढ़ सके। वे इसे “इंडस्ट्रियल-स्केल फ्रॉड” बताते हुए कहते हैं कि यह अमेरिकी प्रतिभाओं के रोजगार अवसरों पर सीधा असर डाल रहा है। उनके मुताबिक, इस तरह की अनियमितताओं के कारण अमेरिकी वर्कफोर्स को नुकसान पहुंच रहा है और विदेशी कर्मचारियों को अनुचित लाभ मिल रहा है।

इस बयान के बाद अमेरिका में राजनीतिक तल्खी और बढ़ गई है, क्योंकि H-1B वीजा अमेरिकी टेक इंडस्ट्री की रीढ़ माना जाता है। बड़ी कंपनियां यह तर्क देती रही हैं कि इस प्रोग्राम की वजह से उन्हें उच्च कौशल वाले इंजीनियर, साइंटिस्ट और टेक्निकल एक्सपर्ट्स मिलते हैं, जो इनोवेशन और विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि कई कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की अपेक्षा कम वेतन वाले विदेशी प्रोफेशनल्स को प्राथमिकता देती हैं, जिससे स्थानीय रोजगार पर दबाव बढ़ता है।

भारत की ओर से अब तक इस दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि चेन्नई के 2.2 लाख वीजा का दावा तथ्यात्मक रूप से संभव नहीं है, क्योंकि अमेरिकी वीजा प्रक्रिया में इतने बड़े स्तर पर अनियमितता बिना रिकॉर्ड के सामने आना मुश्किल है। फिर भी अमेरिकी राजनीतिक माहौल में यह दावा एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह विवाद और गहराने की संभावना है, क्योंकि अमेरिका में चुनावी माहौल भी गर्म है और इमिग्रेशन हमेशा से राजनीतिक बहस का केंद्रीय विषय रहा है।

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