एक दौर था जब सिनेमा का नाम सुनते ही भीड़ उमड़ पड़ती थी — एक टिकट के लिए लंबी कतारें, सीटी बजाते दर्शक और परदे पर सितारों की झलक भर से हॉल तालियों से गूंज उठता था। मगर आज, थिएटर खाली हैं और मेकर्स को दर्शकों को खींचने के लिए ब्लॉकबस्टर प्लानिंग करनी पड़ रही है — फ्री टिकट, सेलिब्रिटी इवेंट्स और एडवांस मार्केटिंग की बौछार। सवाल ये है कि क्या जादू फिल्मों का कम हुआ है, या दर्शकों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं?
ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने जहां घर बैठे मनोरंजन की सुविधा दी है, वहीं थिएटर की बड़ी स्क्रीन का रोमांच अब वैसा महसूस नहीं होता। क्या हमें फिर से वही मजेदार, दिल छू लेने वाली, और सोचने पर मजबूर करने वाली कहानियों की जरूरत है जो सिनेमा को खास बनाती थीं? या फिर अब हर फिल्म को “ब्लॉकबस्टर” बनाने की सोच ने उस मासूमियत और कला को दबा दिया है जो कभी सिनेमा की रूह हुआ करती थी?
अब समय है खुद से पूछने का — दर्शक क्यों दूर हो रहे हैं? क्या थिएटर को फिर से भरने के लिए ‘बड़ी योजना’ चाहिए या बस एक ‘बड़ी कहानी’?















