स्ट्रीट फूड की बात हो और मोमोज का नाम न आए, ऐसा होना मुश्किल है. आज मोमोज भारत के हर शहर और गली-नुक्कड़ पर आसानी से मिल जाते हैं. वेज, पनीर और चिकन जैसे कई फ्लेवर में मिलने वाले मोमोज लोगों की पहली पसंद बन चुके हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मोमोज की शुरुआत चीन से नहीं बल्कि तिब्बत से हुई थी. तिब्बत का ठंडा मौसम भाप में पकने वाले भोजन के लिए उपयुक्त माना जाता था, इसलिए वहां स्टीम्ड डंपलिंग यानी मोमोज बनाए जाने लगे. तिब्बती भाषा में ‘मोमोज’ का अर्थ होता है भाप में पकी हुई डंपलिंग.
इतिहासकारों के अनुसार, मोमोज का सफर तिब्बत से नेपाल और फिर भारत तक पहुंचा. माना जाता है कि 1960 के दशक में जब बड़ी संख्या में तिब्बती लोग भारत आए और दार्जिलिंग, सिक्किम, लद्दाख, धर्मशाला और दिल्ली जैसे इलाकों में बस गए, तब उन्होंने इस व्यंजन को भी यहां के लोगों से साझा किया. धीरे-धीरे मोमोज भारत के पहाड़ी इलाकों से निकलकर मैदानों तक लोकप्रिय हो गए. वहीं, कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि काठमांडू के एक व्यापारी ने तिब्बत यात्रा के दौरान मोमोज की रेसिपी सीखी और इसे नेपाल व भारत तक पहुंचाया.
समय के साथ मोमोज में भी भारतीय स्वाद का तड़का लग गया. अब इन्हें मसालेदार सब्जियों, सोया चंक्स या चिकन से भरा जाता है और तीखी लहसुन वाली चटनी के साथ परोसा जाता है. आज मोमोज सिर्फ एक डिश नहीं, बल्कि भारत के युवाओं का पसंदीदा स्नैक बन चुके हैं, जो तिब्बत से शुरू होकर पूरे देश में स्वाद का पर्याय बन गया है.















