तृणमूल में अंदरूनी खींचतान से एनडीए को संजीवनी, परिसीमन-महिला आरक्षण बिल पास कराना होगा आसान

तृणमूल कांग्रेस में पिछले कुछ हफ्तों से चल रही आंतरिक कलह अब राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा असर डाल सकती है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद और सार्वजनिक बयानबाजी से साफ है कि अंदरूनी गुटबाजी चरम पर है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस स्थिति का सीधा फायदा एनडीए को संसद में मिल सकता है। खासकर लोकसभा में उन विधेयकों को पास कराने में जो दो-तिहाई बहुमत की शर्त पर अटके हुए हैं।

तृणमूल कांग्रेस लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। उसके 29 सांसद हैं। पार्टी में जारी खींचतान के कारण सदन में विपक्षी एकता प्रभावित हो रही है। INDIA गठबंधन की रणनीति बनाने वाली बैठकों में भी तृणमूल की मौजूदगी और रुख को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के कुछ सांसद नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं और फ्लोर मैनेजमेंट के दौरान क्रॉस वोटिंग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

एनडीए के लिए यह स्थिति अवसर की तरह है। सरकार के एजेंडे में परिसीमन और महिला आरक्षण बिल सबसे अहम हैं। परिसीमन बिल के जरिए लोकसभा सीटों का नए सिरे से निर्धारण होना है। यह 2026 के बाद की जनगणना पर आधारित होगा। इसके लिए संविधान संशोधन जरूरी है और लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत चाहिए। मौजूदा समय में एनडीए के पास 293 सांसद हैं। दो-तिहाई के लिए 362 वोट चाहिए। बीजद, वाईएसआर कांग्रेस जैसे दलों के समर्थन के बाद भी संख्या पूरी नहीं होती। ऐसे में तृणमूल में टूट या अनुपस्थिति सरकार का गणित आसान कर देगी।

महिला आरक्षण बिल पहले ही संसद से पास हो चुका है, लेकिन इसे लागू करने के लिए परिसीमन जरूरी है। विपक्ष एकजुट होकर परिसीमन पर सरकार को घेरने की तैयारी में था। तृणमूल की अंदरूनी कलह से यह एकजुटता कमजोर पड़ी है। ममता बनर्जी लगातार डैमेज कंट्रोल में जुटी हैं, मगर पार्टी के लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा, शत्रुघ्न सिन्हा और कल्याण बनर्जी गुट के बीच तालमेल की कमी खुलकर सामने आ रही है।

संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार इन दोनों बिलों को आगे बढ़ा सकती है। यदि तृणमूल के 5-7 सांसद भी वोटिंग के दौरान गैरहाजिर रहते हैं या पाला बदलते हैं, तो एनडीए के लिए दो-तिहाई का आंकड़ा छूना मुश्किल नहीं होगा। बीजेपी के रणनीतिकार इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं। पार्टी का फ्लोर मैनेजमेंट पहले से ज्यादा सक्रिय हो गया है।

हालांकि तृणमूल नेतृत्व ने आधिकारिक तौर पर किसी टूट से इनकार किया है। पार्टी का कहना है कि सभी सांसद एकजुट हैं और मतभेद सिर्फ सांगठनिक स्तर पर हैं। मगर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आने वाले हफ्तों में तस्वीर और साफ हो जाएगी। विपक्ष के लिए यह दोहरी चुनौती है – एक तरफ अपनी पार्टी को एक रखना, दूसरी तरफ संसद में सरकार को संख्याबल जुटाने से रोकना। फिलहाल बाजी एनडीए के पाले में दिख रही है।

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