800 किमी/घंटा की रफ्तार पर डीआरडीओ का सफल हाई-स्पीड रॉकेट स्लेज टेस्ट, लड़ाकू पायलटों की सुरक्षा क्षमता और मजबूत

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने 2 दिसंबर को भारतीय लड़ाकू विमानों की सुरक्षा प्रणाली को और अधिक विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। डीआरडीओ ने चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL) की आधुनिक रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज (RTRS) सुविधा में हाई-स्पीड रॉकेट स्लेज परीक्षण को सफलतापूर्वक पूरा किया। यह परीक्षण लड़ाकू विमान के एस्केप सिस्टम की क्षमता को मान्य करने के लिए किया गया था, जो किसी भी आपात स्थिति में पायलट की जान बचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस परीक्षण में लड़ाकू विमान के कैनोपी सेवरेंस, इजेक्शन अनुक्रमण और एयरक्रू रिकवरी जैसे अहम चरणों की जांच की गई, जिन्हें बेहद उच्च गति पर सफलतापूर्वक परखा गया।

इस चुनौतीपूर्ण परीक्षण में एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए रॉकेट-स्लेज को 800 किलोमीटर प्रति घंटे की सटीक नियंत्रित रफ्तार से चलाया गया। इतनी तेज गति पर एस्केप सिस्टम के सभी तकनीकी घटकों का समन्वय और त्रुटिरहित संचालन किसी भी विमान सुरक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को सिद्ध करता है। डीआरडीओ का यह परीक्षण न केवल तकनीकी उत्कृष्टता का प्रदर्शन है, बल्कि भारतीय वायुसेना के भविष्य के लड़ाकू विमानों की सुरक्षा क्षमता को और मजबूत करने वाला कदम भी है।

इस प्रोजेक्ट में एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ADA और HAL पहले से ही तेजस जैसे आधुनिक स्वदेशी लड़ाकू विमानों के विकास में सक्रिय रूप से शामिल हैं। इस सफल परीक्षण से इन दोनों संस्थाओं को भी अपने विमान विकास कार्यक्रमों में बड़ी मजबूती मिलेगी। विशेषकर उन परियोजनाओं में, जिनमें अत्याधुनिक इजेक्शन सीट और आपातकालीन निकलाव तंत्र की आवश्यकता होती है।

एस्केप सिस्टम किसी भी लड़ाकू विमान का सबसे अहम सुरक्षा उपकरण होता है। जब विमान बेहद उच्च गति या खतरनाक परिस्थिति में होता है और पायलट के पास नियंत्रण खोने की स्थिति बनती है, तब एस्केप सिस्टम ही उसे विमान से सुरक्षित बाहर निकालता है। इस प्रक्रिया में कैनोपी का तुरंत हटना, पायलट की सीट का समयबद्ध इजेक्शन, पैराशूट का खुलना और अंततः सुरक्षित लैंडिंग—इन सभी चरणों का सटीक क्रम और गति बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
इस परीक्षण में कैनोपी सेवरेंस सिस्टम को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि सेकंड के हिस्सों में कैनोपी टूटे और रास्ता साफ हो जाए। इसके बाद इजेक्शन सीट का सक्रिय होना और एयरक्रू की सुरक्षित रिकवरी की प्रक्रिया को 800 किमी/घंटा की रफ्तार पर सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया गया। यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारत अब उच्चतम अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पायलट सुरक्षा प्रणालियों का विकास करने में सक्षम हो चुका है।

डीआरडीओ का यह सफल परीक्षण आत्मनिर्भर भारत के रक्षा क्षेत्र को एक और बड़ी मजबूती प्रदान करता है। इससे न केवल देश के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों को नई दिशा मिलेगी, बल्कि भारतीय वायुसेना को भी युद्धक स्थितियों में अधिक भरोसेमंद सुरक्षा तंत्र प्राप्त होगा। यह उपलब्धि आगामी स्वदेशी लड़ाकू विमानों और उन्नत सुरक्षा प्रणालियों के विकास को गति देने वाली साबित होगी।

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