कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह एक बार फिर राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करने के बाद उनके खिलाफ सवाल उठने लगे। इस पर दिग्विजय सिंह ने सफाई देते हुए कहा कि वे भाजपा और आरएसएस की विचारधारा के हमेशा विरोधी रहे हैं और आगे भी रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि किसी तस्वीर को साझा करना विचारधारात्मक समर्थन नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे संदर्भ और भाव के साथ समझा जाना चाहिए।
दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया कि उनका राजनीतिक जीवन वैचारिक संघर्ष से भरा रहा है। उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक समरसता की राजनीति की है। भाजपा और आरएसएस की राजनीति को वे विभाजनकारी मानते हैं और इसी वजह से उसका विरोध करते रहे हैं। विवाद के बीच उन्होंने यह भी कहा कि व्यक्तिगत स्तर पर किसी नेता की उम्र, स्वास्थ्य या स्थिति को लेकर संवेदना व्यक्त करना और वैचारिक असहमति रखना दो अलग बातें हैं।
उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में सोशल मीडिया पर किसी भी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। एक तस्वीर या एक पंक्ति को पूरे राजनीतिक जीवन के नजरिए से जोड़ देना अनुचित है। दिग्विजय सिंह के मुताबिक, उनका विरोध किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस विचारधारा से है जो देश को बांटने का काम करती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि राजनीति में असहमति का मतलब नफरत नहीं होता।
इस पूरे विवाद के दौरान दिग्विजय सिंह के शब्दों में भावनात्मक पीड़ा भी साफ झलकी। उन्होंने कहा कि दशकों की राजनीति के बाद भी उनकी नीयत पर सवाल उठना दुखद है। उन्होंने याद दिलाया कि उन्होंने हमेशा अल्पसंख्यकों, दलितों और कमजोर वर्गों के अधिकारों की आवाज उठाई है और सत्ता की राजनीति से अलग एक वैचारिक लड़ाई लड़ी है।कांग्रेस नेताओं ने भी दिग्विजय सिंह के समर्थन में कहा कि उनके बयान और सोशल मीडिया पोस्ट को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि भाजपा समर्थक जानबूझकर इस मुद्दे को तूल दे रहे हैं ताकि असली मुद्दों से ध्यान हटाया जा सके। कुल मिलाकर, यह विवाद एक बार फिर दिखाता है कि भारतीय राजनीति में विचारधारा, संवेदना और सोशल मीडिया के बीच संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है।















