मुजफ्फरनगर। भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने भारत और अमेरिका के बीच जारी अंतरिम ट्रेड डील को लेकर किसानों से संयम बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इस द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और लगातार बदलाव सामने आ रहे हैं, इसलिए इसके पक्ष या विरोध में जल्दबाजी करना उचित नहीं होगा। 6 फरवरी को जारी संयुक्त बयान में 10 फरवरी को कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए गए, जिनमें कृषि उत्पादों की सूची से दालों का नाम हटाया जाना भी शामिल है। इसके अलावा कई शब्दों और प्रावधानों में परिवर्तन हुआ है। हाल ही में यह भी चर्चा है कि टेक्सटाइल सेक्टर में अमेरिका भारत को बांग्लादेश के बराबर लाभ देने पर सहमत हो सकता है, जिससे कपड़ों पर शून्य प्रतिशत ड्यूटी लागू हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा लाभ कपास उत्पादक किसानों को मिलेगा।
धर्मेंद्र मलिक ने कहा कि अभी तक डील के समर्थन या विरोध में जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वे केवल अनुमान पर आधारित हैं और उनके समर्थन में ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग किसानों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने किसान भाइयों से अपील की कि वे किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले पूरी जानकारी लें और अपनी समझ से फैसला करें। इस डील को फसलवार आधार पर समझना जरूरी है।उन्होंने बताया कि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने का प्रस्ताव दिया है, जो निर्यातकों के लिए राहत की बात है। बासमती चावल के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वर्ष 2024-25 में भारत ने 304.78 मिलियन डॉलर का बासमती चावल अमेरिका को निर्यात किया। कम टैरिफ से इसकी कीमत प्रतिस्पर्धी होगी और मांग बढ़ेगी, जिससे पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को लाभ मिलेगा। इसी तरह मसाला निर्यात 2024-25 में 36,765 करोड़ रुपये रहा है। हल्दी, मिर्च, जीरा, काली मिर्च और इलायची जैसे उत्पाद अमेरिकी बाजार में और अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं, जिससे केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के किसानों को फायदा होगा।
डील के तहत भारत कुछ अमेरिकी कृषि और खाद्य उत्पादों पर शुल्क घटाने या सीमित आयात की अनुमति देने पर विचार कर रहा है। इनमें डीडीजीएस, लाल ज्वार, मेवे, ताजे और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि मांस, डेयरी और अनाज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में घरेलू हित सुरक्षित रखने की बात कही गई है।उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था बड़े और निर्यात उन्मुख किसानों के लिए अवसर साबित हो सकती है, लेकिन छोटे दलहन और तेलहन उत्पादकों के लिए जोखिम भी पैदा कर सकती है। भारत पहले से ही अपनी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है, जिसमें पाम ऑयल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल शामिल हैं। इसलिए आयात का मुद्दा नया नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि सरकार को गैर-शुल्क बाधाओं, आयात कोटा और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे सुरक्षा उपायों को मजबूत बनाए रखना चाहिए। भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक ने मांग की है कि भारत सरकार किसी भी सूरत में किसान हितों से समझौता न करे।















