ग्रीनलैंड एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी बताया है, जिसके बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। सवाल उठता है कि आखिर बर्फ से ढका यह विशाल द्वीप अमेरिका के लिए इतना अहम क्यों है और इसका इतिहास क्या कहता है।
ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से बेहद रणनीतिक स्थान पर स्थित है। यह यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच सबसे छोटा हवाई और समुद्री रास्ता प्रदान करता है। शीत युद्ध के दौर से ही अमेरिका इसे सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मानता रहा है। वर्ष 1951 में अमेरिका और डेनमार्क के बीच एक अहम रक्षा समझौता हुआ था, जिसके तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने और रडार सिस्टम स्थापित करने की अनुमति मिली। इसी समझौते के तहत थुले एयर बेस बनाया गया, जो आज भी मिसाइल चेतावनी और अंतरिक्ष निगरानी में अहम भूमिका निभाता है।
डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि बदलते वैश्विक हालात, खासकर रूस और चीन की आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए ग्रीनलैंड की सुरक्षा अमेरिका के हाथ में होना जरूरी है। यहां मौजूद दुर्लभ खनिज, तेल और गैस जैसे प्राकृतिक संसाधन भी अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ाते हैं। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र में नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जिससे ग्रीनलैंड का सामरिक महत्व और बढ़ गया है।
हालांकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने साफ कहा है कि ग्रीनलैंड न तो बिक्री के लिए है और न ही किसी बाहरी देश के नियंत्रण में जाएगा। ग्रीनलैंड लंबे समय से अधिक स्वायत्तता और पूर्ण आजादी की दिशा में आगे बढ़ रहा है। वहां की जनता अपने संसाधनों और भविष्य पर खुद फैसला करना चाहती है।
कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा, संसाधनों और राजनीतिक प्रभुत्व की लड़ाई का अहम मोर्चा बन चुका है, जहां अमेरिका की रणनीति और स्थानीय स्वायत्तता की मांग आमने-सामने खड़ी दिखाई देती है।















