दिल्ली हाई कोर्ट ने राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा की उस याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें उन्होंने इंटरनेट और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध अपने बारे में कथित मानहानिकारक एवं व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करने वाली सभी सामग्री को हटाने की मांग की थी। अदालत ने इस मामले में व्यापक राहत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि उपलब्ध अधिकांश सामग्री पहली नजर में न तो मानहानिकारक प्रतीत होती है और न ही उससे याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत अधिकारों का ऐसा उल्लंघन होता है, जिसके आधार पर सभी कंटेंट को हटाने का अंतरिम आदेश जारी किया जाए। हालांकि, अदालत ने उन पांच दस्तावेजों को हटाने का निर्देश दिया है, जिनमें कथित रूप से छेड़छाड़ या फेरबदल किया गया था और जिनकी प्रामाणिकता पर सवाल उठाए गए थे।मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक जीवन से जुड़े नेताओं और जनप्रतिनिधियों को आलोचना का सामना करना पड़ता है। न्यायालय ने कहा कि किसी राजनीतिक व्यक्ति के बारे में की गई हर टिप्पणी या आलोचना को मानहानि या व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यदि सामग्री राजनीतिक विमर्श या आलोचना का हिस्सा है और उसमें प्रथम दृष्टया कोई अवैध या आपत्तिजनक तत्व नहीं है, तो उसे हटाने के लिए व्यापक आदेश देना उचित नहीं होगा।
गौरतलब है कि इस मामले में 21 मई को अंतरिम रोक संबंधी अर्जी पर सुनवाई के दौरान भी दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रारंभिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता द्वारा जिन सामग्रियों का उल्लेख किया गया है, वे प्रथम दृष्टया उनके व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करती हुई नहीं दिखतीं। अदालत ने यह भी कहा था कि संबंधित सामग्री अधिकतर राजनीतिक आलोचना की श्रेणी में आती है, जिसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यापक दायरे में देखा जाना चाहिए।
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ताजा आदेश में हाई कोर्ट ने अपने इसी रुख को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि पूरे इंटरनेट से सभी संबंधित सामग्री हटाने जैसा व्यापक अंतरिम आदेश देने का कोई आधार नहीं बनता। साथ ही, अदालत ने केवल उन पांच छेड़छाड़ किए गए दस्तावेजों को हटाने का निर्देश दिया, जिनकी सत्यता संदिग्ध पाई गई। इस फैसले को व्यक्तिगत अधिकारों, मानहानि और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है।















