अरावली विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान, पर्यावरण संरक्षण पर फिर टिकी देश की निगाहें

अरावली पर्वतमाला से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई का फैसला किया है। देश की सर्वोच्च अदालत में आज इस संवेदनशील मुद्दे पर सीजेआई श्री मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों की पीठ सुनवाई करेगी। यह मामला केंद्र और कुछ राज्य सरकारों द्वारा अरावली रेंज की नई परिभाषा तय किए जाने से जुड़ा है, जिस पर पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने गहरी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि अरावली की पहचान को केवल 100 मीटर की ऊंचाई के मानदंड से जोड़ना न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है, बल्कि इससे अरावली क्षेत्र का बड़ा हिस्सा खनन और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए खुल सकता है, जो पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा साबित होगा।

अरावली पर्वतमाला देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और यह राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात के बड़े हिस्से में फैली हुई है। यह क्षेत्र न केवल जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है, बल्कि भूजल स्तर बनाए रखने, रेगिस्तान के फैलाव को रोकने और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी अहम भूमिका निभाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अरावली के संरक्षित क्षेत्रों में खनन को अनुमति दी गई तो इससे दिल्ली-एनसीआर समेत आसपास के इलाकों में पर्यावरणीय असंतुलन और गंभीर हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और निर्माण गतिविधियों पर सख्त रुख अपनाता रहा है। अदालत ने कई बार स्पष्ट किया है कि पर्यावरण संरक्षण संवैधानिक दायित्व है और विकास के नाम पर प्राकृतिक धरोहर को नष्ट नहीं किया जा सकता। वर्तमान मामले में नई परिभाषा को लेकर यह आशंका जताई जा रही है कि पुराने संरक्षण आदेशों को कमजोर किया जा सकता है। इसी कारण सर्वोच्च अदालत का स्वतः संज्ञान लेना बेहद अहम माना जा रहा है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि अरावली केवल ऊंचाई का विषय नहीं है, बल्कि इसकी भौगोलिक संरचना, वनस्पति, जलधारण क्षमता और पारिस्थितिकी तंत्र को समग्र रूप से समझने की जरूरत है। यदि केवल ऊंचाई को आधार बनाया गया तो अरावली के कई ऐसे हिस्से, जो पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं, संरक्षण से बाहर हो जाएंगे। इससे आने वाली पीढ़ियों को गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ सकता है।

आज होने वाली सुनवाई से यह उम्मीद की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशा-निर्देश देगा और अरावली की परिभाषा व संरक्षण से जुड़े सभी पहलुओं पर गहन विचार करेगा। देशभर के पर्यावरणविदों, कानूनी विशेषज्ञों और आम नागरिकों की निगाहें इस सुनवाई पर टिकी हैं, क्योंकि इसका असर न केवल अरावली क्षेत्र पर बल्कि पूरे देश की पर्यावरण नीति पर भी पड़ सकता है।

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