उत्तर प्रदेश समेत 5 राज्यों के चुनाव से पहले बीजेपी नए सिरे से सवर्णों को साधने में जुट गई है. इसके लिए पिछले एक हफ्ते में बैक टू बैक 2 बड़े फैसले लिए गया हैं. पहला फैसला जाति जनगणना से जुड़ा है तो दूसरा फैसला यूजीसी इक्विटी नियम से.दरअसल, हाल ही में जनगणना का जो ड्राफ्ट केंद्र सरकार ने जारी किया है, उसमें जाति को उपजाति में नहीं बांटा गया है. इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं. कहा जा रहा है कि बीजेपी ने सवर्णों को खुश करने के लिए यह फैसला लिया है.
वहीं गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र ने कहा कि हम यूजीसी इक्विटी नियम 2026 में बदलाव के लिए पुनर्विचार कर रहे हैं. इन दोनों फैसलों को बीजेपी की तरफ से सवर्णों को साधने के तौर पर देखा जा रहा है.
2 बड़े फैसलों की डिटेल समझिए
1. बीजेपी सरकार ने अपर कास्ट को रिझाने के लिए दो अहम फैसले किए हैं. पहला फैसला जातिगत जनगणना से जुड़ा है. इसमें कास्ट सेंसस के दौरान उपजातियों को अलग-अलग बांटकर दर्ज नहीं किया गया है. राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव के मुताबिक इस तरीके से जाति गणना का सटीक और विस्तृत डेटा सामने नहीं आ पाएगा.
साल 2012 में हुए सोशल इकोनॉमिक्स सर्वे में भी कुछ इसी तरह का तरीका अपनाया गया था, जिसमें देशभर से करीब 47 लाख जातियां सामने आई थीं. माना जा रहा है कि उपजातियों को अलग-अलग गिनने से बचकर सरकार ने सवर्ण समाज के भीतर की एकजुटता को बनाए रखने की कोशिश की है.
2. दूसरा फैसला यूजीसी की इक्विटी नीति से जुड़ा है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह साफ किया कि वह यूजीसी की इक्विटी नीति पर पुनर्विचार कर रही है. गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्र ने कहा कि हम विचार कर रहे हैं.
दरअसल, इस नीति को लेकर अपर कास्ट समाज में लंबे समय से नाराजगी थी, क्योंकि माना जा रहा था कि इस कानून से विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले सामान्य वर्ग के छात्रों को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. सरकार के इस कदम को सवर्ण समाज की चिंताओं को शांत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
सवर्णों को क्यों साध रही है बीजेपी?
फरवरी 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब में विधानसभा के चुनाव होने हैं. इनमें से 4 राज्यों में इस वक्त बीजेपी की सरकार है. यूपी देश का सबसे बड़ा सूबा है, जहां सवर्ण वोटर्स काफी अहम माने जाते हैं.बीजेपी ने यूपी में तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए सवर्णों को साधना काफी जरूरी है. यही वजह है कि बीजेपी ने नए सिरे से सवर्णों को साध रही है. स्थापना के वक्त से ही सवर्णों को बीजेपी का कोर वोटर्स माना जाता रहा है.
यूपी में कितने सवर्ण हैं?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सवर्ण यानी सामान्य वर्ग की भूमिका शुरू से ही अहम रही है. राज्य में सवर्णों की आबादी कुल जनसंख्या का करीब 15 से 19 प्रतिशत मानी जाती है. इनमें ब्राह्मण समाज की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा करीब 9 से 10 प्रतिशत है. इसके बाद राजपूत यानी ठाकुर समाज करीब 5 प्रतिशत, भूमिहार समाज करीब 2 प्रतिशत और वैश्य (बनिया) समाज भी करीब 2 प्रतिशत है.
इसके अलावा कायस्थ और अन्य सवर्ण जातियां शेष हिस्से में आती हैं. इतनी बड़ी संख्या किसी भी पार्टी के लिए चुनावी नजरिए से जरअंदाज करना आसान नहीं है.
सवर्ण आखिर क्यों जरूरी हैं?
ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया और कायस्थ जैसे सवर्ण समुदाय परंपरागत रूप से चुनावों में निर्णायक और अनुशासित मतदान के लिए जाने जाते रहे हैं. पिछड़ों और दलितों के सियासी उभार के बाद से राजनीतिक दलों के लिए सत्ता में बने रहने के वास्ते सवर्ण वोटों के साथ संतुलन बनाना जरूरी हो गया है.
साल 2007 में जब बीएसपी को यूपी में पूर्ण बहुमत मिला था, तो उसके पीछे दलित, ब्राह्मण और पिछड़ा वर्ग का साझा गठजोड़ था. 2007 के बाद के आंकड़े देखें तो 2009 के लोकसभा चुनाव में करीब 53 प्रतिशत ब्राह्मणों ने यूपी में बीजेपी को वोट दिया था.
हालांकि 2012 के विधानसभा चुनाव में सवर्णों का रुख कुछ अलग रहा. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी को सवर्णों का काफी मजबूत और अप्रत्याशित समर्थन मिला, जिसने पार्टी को 224 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाई.
सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे के मुताबिक 2012 में करीब 19 प्रतिशत ब्राह्मणों ने सपा को वोट दिया था, वहीं राजपूत समाज के वोट शेयर में भी सपा को करीब 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी मिली थी. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में सवर्णों ने फिर से बीजेपी का साथ दिया.
यही पैटर्न आगे चलकर 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिला, जब सवर्णों का साथ एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी को मिला. यही वजह है कि बीजेपी अपने इस कोर वोटर बैंक को किसी भी हाल में खोना नहीं चाहती और चुनाव से पहले उठाए गए ये दो फैसले इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं.























































