राजस्थान के अलवर में 22 अक्टूबर को ITBP के एक कार्यक्रम में महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने चीन की सैन्य ताकत का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि चीन भारत का शक्तिशाली पड़ोसी और सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है.उससे लगी सीमा देश के सबसे कठिन मोर्चों में शामिल है. कपूर ने यह भी बताया कि चीन ने अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को आधुनिक बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया है. उसकी सेना नए हथियारों और तकनीक से लैस हो रही है. इसलिए पुराने युद्ध के तरीकों पर निर्भर रहकर चीन से पार पाना मुश्किल है.
चीन से लगी सीमा भारत की सबसे कठिन सीमा है और चीन एक शक्तिशाली पड़ोसी के साथ-साथ तथा भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है. उससे मुकाबला करने के लिए बल की क्षमताओं को बढ़ाना जरूरी है. ड्रोन एक बड़ी चुनौती बन गए हैं और अवसर भी. पारंपरिक तरीकों से चीन का मुकाबला करना मुश्किल होगा. उसने अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) का आधुनिकीकरण किया है और उस पर भारी निवेश किया है. लेकिन ड्रोन ऐसी तकनीक हैं, जिनसे छोटा देश भी बड़े देश को कड़ी टक्कर दे सकता है- ITBP महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर
महानिदेशक कपूर ने केवल खतरे की बात नहीं की. उन्होंने इससे निपटने का रास्ता भी बताया. उनका जोर ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक पर था. उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध का उदाहरण दिया. कहा कि अब युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है. ड्रोन जैसी तकनीक के सहारे छोटा देश भी बड़ी सैन्य शक्ति को चुनौती दे सकता है. इसलिए ITBP को भी नई तकनीक के मुताबिक अपनी तैयारी बढ़ानी होगी.
अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन के बीच क्या चल रहा है?
ITBP महानिदेशक ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों में भारतीय और चीनी जवान आमने-सामने आए हैं. कुछ स्थानों पर यह स्थिति अब भी बनी हुई है. यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में तनाव की खबरें पहले भी सामने आ चुकी थीं. सितंबर में दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच बातचीत भी हुई थी. रिपोर्टों के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश के ताकसिंग क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए 6 सितंबर को वाचा-दामाई सीमा बैठक स्थल पर कोर कमांडर स्तर की बातचीत हुई थी. इसके बावजूद ITBP प्रमुख के ताजा बयान से पता चलता है कि कुछ स्थानों पर आमने-सामने की स्थिति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
उनके बयान के अगले दिन यानी 23 अक्टूबर को विदेश मंत्रालय ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी. मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि जब चीनी सैनिक स्थापित गश्ती व्यवस्था से अलग गतिविधियां करते हैं, तो सीमा पर तनाव पैदा होता है. उन्होंने बताया कि भारत और चीन विवाद सुलझाने के लिए सैन्य और कूटनीतिक माध्यमों का इस्तेमाल कर रहे हैं. दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को लेकर गलतफहमी दूर करने के उपायों पर भी बातचीत कर रहे हैं.
यानी एक तरफ बातचीत जारी है, दूसरी तरफ सीमा पर चुनौतियां भी बनी हुई हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इन चुनौतियों के मुकाबले भारत ने पिछले वर्षों में अपनी तैयारी कितनी बढ़ाई है.
ITBP चीफ के बयान से मोदी सरकार के 12 साल पर सवाल क्यों?
नरेंद्र मोदी मई 2014 में प्रधानमंत्री बने थे. अक्टूबर 2026 तक केंद्र में उनके नेतृत्व वाली सरकार को 12 साल से अधिक समय हो चुका है. इस दौरान सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा है. रक्षा बजट बढ़ाने, आधुनिक हथियार खरीदने और सीमावर्ती इलाकों में बुनियादी ढांचा मजबूत करने पर जोर दिया गया है. लेकिन ITBP प्रमुख का बयान इस बहस को फिर से हवा दे दी है.
क्या चीन का मुकाबला करने के लिए भारत पूरी तरह तैयार है?
ITBP प्रमुख के बयान के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है. लेकिन इसका जवाब केवल एक अधिकारी के बयान या रक्षा बजट के आंकड़ों से नहीं दिया जा सकता. कपूर ने यह नहीं कहा कि भारतीय सेना हर क्षेत्र में चीन से कमजोर है. उन्होंने मुख्य रूप से चीन के सैन्य आधुनिकीकरण और पुराने युद्ध तरीकों की सीमाओं की बात की है.
किसी देश की सैन्य ताकत का आकलन करते समय कई पहलुओं को देखना होता है. इनमें हथियारों की गुणवत्ता, सैनिकों का प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, सीमावर्ती सड़कें, निगरानी प्रणाली और जरूरत पड़ने पर तेजी से कार्रवाई करने की क्षमता शामिल हैं. भारत ने पिछले कुछ सालों में इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया है. वहीं चीन भी अपनी सैन्य क्षमता और तकनीक को लगातार मजबूत कर रहा है.ऐसे में असली सवाल यह नहीं है कि भारत ने रक्षा क्षेत्र में कितना पैसा लगाया. सवाल यह है कि उस निवेश का कितना फायदा सीमा पर तैनात जवानों तक पहुंचा. कौन-सी नई तकनीक उपलब्ध हो चुकी है और किन सुविधाओं की अभी जरूरत है. अरुणाचल प्रदेश में जारी आमने-सामने की स्थिति इन सवालों को और महत्वपूर्ण बना देती है.
ITBP महानिदेशक के बयान का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सीमा सुरक्षा की तैयारी एक बार पूरी कर लेने वाला काम नहीं है. चीन की सैन्य ताकत और युद्ध की तकनीक बदल रही है, तो भारत को भी अपनी रणनीति लगातार बदलनी होगी. क्योंकि किसी संकट की स्थिति में असली परीक्षा रक्षा बजट के आंकड़ों की नहीं, बल्कि सीमा पर तैनात जवानों की तैयारी, आधुनिक हथियारों और उपलब्ध संसाधनों की होगी.















