बीजेपी के वरिष्ठ नेता, पूर्व उप प्रधानमंत्री और भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी का आज जन्मदिन है. आडवाणी आज 100वें साल में प्रवेश कर रहे हैं. इस मौके पर तमाम नेता उन्हें बधाई दे रहे हैं. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें जन्मदिन शुभकामनाएं दी. इसके साथ ही पीएम ने एक लेख के जरिए आडवाणी की जिंदगी के सफर और देश के लिए उनके योगदान को याद किया है.पीएम ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर किया, जिसमें उन्होंने कहा ‘आज, 8 नवंबर, एक बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है. आदरणीय एल.के. आडवाणी जी अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं. इस विशेष अवसर पर, मैं उन्हें अपनी शुभकामनाएं देता हूं. मैंने एक लेख लिखा है, जिसमें मैंने भारत के प्रति उनके अमूल्य योगदान को रेखांकित किया है’.
पीएम मोदी ने लिखा लेख
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लेख में लिखा ‘आज, 8 नवंबर को लाल कृष्ण आडवाणी अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं. संयोग से, इस वर्ष उनका जन्मदिन दीपावली के साथ पड़ रहा है, एक ऐसा त्योहार जो भगवान राम और दीप से जुड़ा है. यह एक ऐसे समय में हो रहा है जब हम जनसंघ की स्थापना के 75 वर्ष, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मना रहे हैं, और हाल ही में हमने RSS के 100 वर्ष पूरे होने का उत्सव भी मनाया है’.
आडवाणी के जन्मदिन पर भावुक हुए पीएम
पीएम मोदी ने कहा कि आज का ये अवसर उनके लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत भावुक कर देने वाला है. उन्होंने कहा ‘मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे हमेशा आडवाणी जी का स्नेह, सान्निध्य और मार्गदर्शन मिलता रहा है। आज उनके साथ बिताए हुए अनगिनत पल, उनसे जुड़ी कितनी ही स्मृतियां मन में उमड़ रही हैं’पीएम मोदी ने कहा कि ऐसे बहुत कम लोग हैं जिनका जीवन आधुनिक भारत के इतने अलग-अलग अध्यायों से जुड़ा रहा हो. उन्होंने कहा ‘आडवाणी जी का जन्म 8 नवंबर 1927 को, देव दीपावली के दिन हुआ था. 1947 में, युवावस्था के दौरान, उन्हें सिंध में अपनी जानी-पहचानी दुनिया को पीछे छोड़ने का दर्द सहना पड़ा. उन्होंने बिना किसी कड़वाहट के शून्य से अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया. विपरीत परिस्थितियों में भी शून्य से शुरुआत करने की यह खूबी उनके साथ हमेशा बनी रही. यह तब देखने को मिला जब वे जनसंघ को मजबूत कर रहे थे और बाद में जब उन्होंने बीजेपी का निर्माण किया. बीजेपी अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान, 1989 में कांग्रेस की सीटें 400 से गिरकर 200 से नीचे आ गईं, और 1996 में बीजेपी पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. आडवाणी जी ने कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियों को तैयार किया और पार्टी को ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ (Nation First) के सिद्धांत पर आधारित एक मजबूत नींव दी.
पीएम ने बताई आडवाणी की दो खूबियां
पीएम ने कहा कि दो खूबियां आडवाणी जी को एक नेता के रूप में हमेशा सबसे अलग बनाती हैं. पहली, उनकी वैचारिक स्पष्टता और बौद्धिक प्रखरता.यह उनके भाषणों और लेखों में साफ झलकता था. जनसंघ और बीजेपी के लिए उनके द्वारा तैयार किए गए प्रस्ताव आज भी पढ़ने योग्य हैं, जबकि उनके साक्षात्कार हमेशा सटीक और प्रभावशाली होते थे. उनकी दूसरी खूबी भारतीय राजनीति के एक बड़े वर्ग द्वारा वर्षों से प्रचारित छद्म धर्मनिरपेक्षता (pseudo-secularism) को उजागर करने की क्षमता थी.
‘हर जिम्मेदारी को पूरी लगन और मेहनत से निभाया’
प्रधानमंत्री ने कहा कि आडवाणी जी ने हर जिम्मेदारी को पूरी लगन और मेहनत से निभाया. एक RSS प्रचारक के रूप में, आडवाणी जी ने सबसे पहले राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में काम किया. वहां से वे राष्ट्रीय राजधानी आए, जहां उन्होंने अटल जी के साथ मिलकर काम करना शुरू किया. इतिहास गवाह है कि दो बड़े राजनीतिक नेताओं का कई दशकों तक एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना, और बिना किसी प्रतिस्पर्धा के एक-दूसरे का सहयोग करना, बहुत दुर्लभ है. आडवाणी जी और अटल जी ने एक बेहतरीन मिसाल कायम की. इन दोनों ने मिलकर भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी.पीएम ने कहा कि आडवाणी जी जब दिल्ली आए, तो उस समय दिल्ली बंटवारे की विभीषिका से उबरने की कोशिश कर रही थी. उन्होंने खुद को जनसंघ को मजबूत करने के काम में पूरी तरह लगा दिया. 1967 में, आडवाणी जी दिल्ली मेट्रोपॉलिटन काउंसिल के अध्यक्ष बने, जहां उन्होंने स्वर्गीय विजय कुमार मल्होत्रा जी (जो मुख्य कार्यकारी पार्षद बने) के साथ मिलकर काम किया.
‘भारत का दौरा करते थे और लोगों से मिलते थे’
1970 में, आडवाणी जी की संसदीय पारी की शुरुआत हुई. संसद में उनके विचारों और हस्तक्षेपों को सभी राजनीतिक दलों ने सराहा. एक सांसद के रूप में, और बाद में दोनों सदनों में विपक्ष के नेता के साथ-साथ सत्ता पक्ष की ओर से भी, उन्होंने अपनी एक अलग छाप छोड़ी. संसदीय जिम्मेदारियों के बावजूद, वे अक्सर पूरे भारत का दौरा करते थे और लोगों से मिलते थे.
1991 के लोकसभा चुनाव को किया याद
पीएम मोदी ने कहा ‘मुझे 1991 के लोकसभा चुनाव अच्छी तरह याद हैं. यह तय हुआ था कि आडवाणी जी दो सीटों से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, जिनमें से एक गांधीनगर थी. गुजरात से उनका पुराना नाता था. बंटवारे के बाद उनके पिता कच्छ में बस गए थे. आडवाणी जी गुजरात से राज्यसभा सांसद भी रह चुके थे. इसलिए, यह एक तरह से घर वापसी जैसा था. बीजेपी संगठन से जुड़े होने के नाते, मुझे उनके नामांकन पत्र तैयार करने और पूरे चुनाव प्रचार के दौरान उनकी मदद करने का सौभाग्य मिला. गांधीनगर की जनता ने उन्हें बार-बार संसद भेजा. गांधीनगर के एक मतदाता के रूप में, मुझे भी कई बार आडवाणी जी को वोट देने का सौभाग्य मिला. उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति जो देखभाल और ध्यान दिया, वह वास्तव में सीखने लायक है’
आपातकाल का जिक्र
प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि आपातकाल (इमरजेंसी) आडवाणी जी के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था. लोकतंत्र को बचाने और संविधान की रक्षा करने में वे सबसे आगे थे. उनके अनुभवों को उनकी किताब ‘अ प्रिजनर्स स्क्रैप-बुक’ (A Prisoner’s Scrap-Book) में जगह मिली. इस किताब के एक हिस्से, जिसका शीर्षक ‘अ टेल ऑफ टू इमरजेंसीज़’ (A Tale of Two Emergencies) है, में जून 1975 से भारत में घटी घटनाओं और 1933 के नाज़ी जर्मनी की घटनाओं के बीच की चौंकाने वाली समानताओं को बहुत खूबसूरती से समझाया गया है.
‘प्रखर विपक्षी नेता के साथ बेहतरीन प्रशासक भी थे’
पीएम ने कहा कि आडवाणी जी एक प्रखर विपक्षी नेता होने के साथ-साथ एक बेहतरीन प्रशासक भी थे. 1977 में जब जनता सरकार सत्ता में आई, तो आडवाणी जी सूचना और प्रसारण मंत्री बने.यह सर्वमान्य है कि इस विभाग में उनका काम बेहद प्रभावशाली रहा. उप-प्रधानमंत्री और भारत के सबसे लंबे समय तक गृह मंत्री रहने वालों में से एक के रूप में, उन्होंने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई. हमारे सुरक्षा बलों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए किए गए उनके कार्यों को आज भी बहुत सम्मान और स्नेह के साथ याद किया जाता है. आतंकवाद के खिलाफ उनके सख्त रुख के कारण ही भारत को एक मजबूत आतंकवाद-विरोधी कानून मिल सका.
सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा का जिक्र
अपने लेख में पीएम मोदी ने सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से, आडवाणी जी के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव ‘सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा’ थी. इसने भारतीय समाज की दिशा को सकारात्मक रूप से बदल दिया. मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि मुझे इस यात्रा में, इसके विचार बनने से लेकर इसके क्रियान्वयन तक, शामिल होने का अवसर मिला. जब यह यात्रा शुरू हुई, तब सोमनाथ में मौजूद होना मेरे लिए विशेष रूप से यादगार था. एक रथ यात्रा बहुत चुनौतीपूर्ण हो सकती है; इसमें लंबे समय तक काम करना, लगातार यात्रा करना, शारीरिक सहनशक्ति और थकान के बावजूद अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहना पड़ता है. आडवाणी जी ने इस सहनशक्ति का बेहतरीन उदाहरण पेश किया.आडवाणी की गिरफ्तारी को याद करते हुए पीएम ने कहा कि मुझे बिहार में आडवाणी जी की गिरफ्तारी के दुखद पलों की भी याद है. इसके बाद, गुजरात में बीजेपी ने चिमनभाई पटेल की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. इससे एक स्पष्ट संदेश गया कि जब हमारी विचारधारा और राम मंदिर की बात आती है, तो कोई समझौता नहीं किया जाएगा. हमारे कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने संकल्प लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, राम मंदिर का निर्माण होकर रहेगा. और, कई वर्षों बाद भारत की जनता के आशीर्वाद से अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर एक वास्तविकता बन गया.
‘सामान्य कार्यकर्ता की तरह रहे आडवाणी’
पीएम मोदी ने कहा कि आडवाणी जी के व्यक्तित्व में और भी बहुत कुछ है जो असाधारण है. उदाहरण के लिए, उनका सादगीपूर्ण स्वभाव. नवनिर्माण आंदोलन के बाद, आडवाणी जी जूनागढ़ आए और एक महीने तक एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह रहे. उन्होंने विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार किया, जिनमें कांग्रेस को नकार दिया गया था. उन्होंने हमेशा दिखाया है कि सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और शुचिता क्या होती है. उन्हें पढ़ने का बहुत शौक है. जो लोग उनके साथ रहे हैं, वे जानते हैं कि वे कितनी बारीकी से अखबार पढ़ते हैं. उन्हें सिनेमा और थिएटर का बहुत शौक है, और वे एक उत्साही फिल्म समीक्षक भी रहे हैं. इतिहास की उनकी समझ और उसे सहेजने की आवश्यकता उनकी पुस्तक ‘माई कंट्री माई लाइफ’ में साफ झलकती है.आडवाणी जी हमेशा सिंधी संस्कृति से जुड़े रहे. उन्होंने एक और पहल की, जो लेह के पास ‘सिंधु दर्शन पूजा’ को लोकप्रिय बनाने की थी. मैं खुद आडवाणी जी और जॉर्ज फर्नांडीस जी के साथ ऐसी ही एक पूजा में शामिल हुआ था.
कमला आडवाणी को भी किया याद
पीएम ने आगे कहा कि आडवाणी जी के असाधारण सफर का कोई भी विवरण कमला आडवाणी जी के जिक्र के बिना अधूरा होगा. उनके सार्वजनिक जीवन में, वे हमेशा उनके लिए ताकत और सहारे का स्रोत रहीं.कराची में पले-बढ़े आडवाणी जी ने शायद ही कभी सोचा होगा कि उनका जीवन किस दिशा में आगे बढ़ेगा. कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, भारत के लोगों ने 2024 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया. जैसे ही आडवाणी जी अपने जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, मैं प्रार्थना करता हूं कि उनका स्वास्थ्य उत्तम रहे और वे हमेशा की तरह हम सभी को प्रेरित करते रहें.















