ब्राजील में राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजनीति में आखिरी फैसला जनता करती है. जिस चुनाव में उनकी हार की आशंका गहराने लगी थी, डोनाल्ड ट्रंप अपने भाषणों में जिसका जिक्र करने लगे थे, लेकिन बाजी पलट गई. लूला दा सिल्वा ने इसी चुनाव में ऐसी वापसी की कि इतिहास बन गया.25 अक्टूबर, 2026 को हुए राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर में 80 साल के लूला ने दक्षिणपंथी नेता फ्लावियो बोल्सोनारो को हराकर चौथी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ किया.
इस चुनाव को लेकर इसलिए लूला की हार की आशंकाएं गहरा गई थीं क्योंकि पहले दौर में लूला पीछे रह गए थे. हालांकि अंतिम मुकाबले में उन्होंने बाजी पलट दी. ब्राजील के चुनावी इतिहास में यह एक असाधारण उलटफेर है. दिलचस्प ये भी है कि इस नतीजे का असर सिर्फ ब्राजील तक सीमित नहीं है. यह ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और लूला के रिश्तों में तनाव रहा है. दक्षिणपंथी राजनीति के लिए भी यह नतीजा अहम है, क्योंकि फ्लावियो पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं और ट्रंप के राजनीतिक खेमे के करीब माने जाते हैं.
लूला का ऐसा कमबैक, निराश हुआ व्हाइट हाउस
लूला की वापसी के आंकड़े इस चुनाव की कहानी खुद बताते हैं. पहले दौर में फ्लावियो बोल्सोनारो को 47.03% वोट मिले थे, जबकि लूला को 45.16% वोटों से संतोष करना पड़ा यानी लूला करीब 2.2 लाख नहीं, बल्कि लगभग 22 लाख वोटों के अंतर से पीछे थे. बस यहीं से अटकलें लगने लगी थीं कि लूला को हार का मुंह देखना पड़ सकता है. हालांकि दूसरे दौर में उन्होंने 51.79% वोट हासिल किए, जबकि फ्लावियो को करीब 48.21% वोट मिले. लूला को 6.42 करोड़ से ज्यादा वोट मिले. यह ब्राजील में लोकतांत्रिक दौर का पहला ऐसा राष्ट्रपति चुनाव है, जिसमें पहले दौर में पीछे रहने वाला उम्मीदवार दूसरे दौर में जीत गया.
कैसे लूला दा सिल्वा ने बदला गेम?
आखिरी दौर में लूला की टीम ने सोशल मीडिया पर अभियान तेज किया. सीधे मतदाताओं से संवाद, व्हाट्सऐप के जरिए समर्थकों को जोड़ना और देशभर में रैलियों ने उनकी मुहिम को नई ऊर्जा दी. महंगाई, घरेलू कर्ज और अपराध को लेकर सरकार के खिलाफ नाराजगी जरूर थी, लेकिन लूला ने सामाजिक कल्याण, लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता के मुद्दों पर समर्थन जुटाने की कोशिश की. ये पैंतरा काम भी आया और लूला के पक्ष में वोट इकट्ठा हुए.















