लाओस में चीन की बढ़ती मिलिट्री मौजूदगी ने दक्षिण-पूर्व एशिया में नई रणनीतिक चिंता पैदा कर दी है. चीन ने लाओस के बान केउन एयरबेस पर अपने 8 जेट तैनात कर दिए हैं. शी जिनपिंग थाईलैंड, वियतनाम और खासतौर पर अमेरिका के लिए भी एक रणनीतिक चुनौती है, क्योंकि चीन दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी मिलिट्री मौजूदगी का दायरा बढ़ा रहा है.रॉयटर्स की रिपोर्ट के हिसाब से सैटेलाइट तस्वीरों में लाओस के बान केउन में बन रहे नए चीन-लाओस जॉइंट मिलिट्री ट्रेनिंग सेंटर पर 8 K-8 हल्के अटैक जेट और 2 दर्जन से ज्यादा सपोर्ट गाड़ियां दिखाई दी हैं. तस्वीरें 30 सितंबर को कमर्शियल सैटेलाइट कंपनी वैंटोर ने ली थीं.
थाईलैंड और वियतनाम की क्यों बढ़ी चिंता?
- बान केउन की लोकेशन चीन के लिए रणनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है. लाओस की सीमा चीन, थाईलैंड और वियतनाम से लगती है. ऐसे में यहां एक मिलिट्री सेंटर बनने से चीन को दक्षिण-पूर्व एशिया के इस हिस्से में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का मौका मिलता है.
- खासकर थाईलैंड के लिए यह इसलिए अहम है क्योंकि लाओस की पश्चिमी सीमा थाईलैंड से लगती है. वहीं, वियतनाम की पश्चिमी सीमा भी लाओस से जुड़ी है.
- अगर भविष्य में इस एयरफील्ड पर बड़े विमान, निगरानी सिस्टम या इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस से जुड़ी सुविधाएं बढ़ती हैं, तो चीन की क्षेत्रीय निगरानी क्षमता भी बढ़ सकती है.
चीन की विदेशों में बढ़ रही मिलिट्री मौजूदगी
पिछले दो दशक में चीन ने अपनी सेना को तेजी से आधुनिक बनाया है. इसके बावजूद विदेशों में उसके सैन्य ठिकानों का नेटवर्क अभी अमेरिका की तुलना में काफी छोटा है. चीन का जिबूती में लॉजिस्टिक्स बेस है. इसके अलावा कंबोडिया के रीम में उसे पोर्ट एक्सेस मिला है और दक्षिण चीन सागर में भी चीन की मजबूत सैन्य मौजूदगी है.अब लाओस में यह नया सेंटर चीन को मुख्य भूमि दक्षिण-पूर्व एशिया में एक और रणनीतिक जगह दे सकता है. ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की सीनियर एनालिस्ट रेचल वैनडेनब्रिंक के मुताबिक, बान केउन को चुनना किसी बड़ी सैन्य जरूरत के बजाय उपलब्ध मौके का फायदा उठाने जैसा हो सकता है.
उनके मुताबिक, लाओस चीन के लिए इसलिए अहम है क्योंकि इसकी सीमा चीन से लगती है और दोनों देशों के बीच रेलवे समेत कई इंफ्रास्ट्रक्चर लिंक हैं. यही कनेक्टिविटी चीन के लिए सैनिकों और सैन्य सामान की आवाजाही को आसान बना सकती है.
8 K-8 जेट क्यों अहम हैं?
- सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण करने वाले सुरक्षा विशेषज्ञों ने बताया कि वहां दिख रहे विमान होंगडू JL-8 या K-8 जैसे लगते हैं. चीन और लाओस दोनों की वायु सेनाएं इस तरह के विमानों का इस्तेमाल करती हैं.
- K-8 दो सीटों वाला विमान है. इसका इस्तेमाल पायलटों की ट्रेनिंग के साथ-साथ हल्के हमले के लिए भी किया जा सकता है. इसे चीन और पाकिस्तान ने मिलकर विकसित किया था और कई देशों को इसका निर्यात भी किया गया है.
- इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज की रिपोर्ट के मुताबिक, लाओस के पास फिलहाल ऐसे 4 विमान हैं. हालांकि, विशेषज्ञों ने इन विमानों की मौजूदा स्थिति को लेकर सवाल उठाए हैं.
अमेरिका के लिए भी बढ़ सकती है रणनीतिक चुनौती
चीन के इस कदम का असर सिर्फ पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं है. अमेरिका के लिए भी दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी एक रणनीतिक चुनौती हो सकती है.चीन अगर लाओस में स्थायी सैन्य सुविधाएं विकसित करता है, तो उसे मुख्य भूमि दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी सेना को ट्रेनिंग देने, सैन्य गतिविधियां चलाने और निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए एक अतिरिक्त जगह मिल सकती है.हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि बान केउन पूरी तरह चीन का विदेशी मिलिट्री बेस बन चुका है. फिलहाल वहां निर्माण जारी है और तस्वीरों में सीमित संख्या में हल्के विमान और सपोर्ट गाड़ियां ही नजर आई हैं.
कभी अमेरिका का गुप्त एयरफील्ड था बान केउन
बान केउन की कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि कभी इसी जगह का इस्तेमाल अमेरिका के एक गुप्त ऑपरेशन के लिए किया जाता था. वियतनाम युद्ध के दौरान यहां एक एयरफील्ड था, जिसे लीमा साइट 44 के नाम से जाना जाता था. लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस के दक्षिण-पूर्व एशिया विशेषज्ञ रयान वोल्फसन-फोर्ड के मुताबिक, इसका इस्तेमाल एयर अमेरिका करती थी.
एयर अमेरिका CIA से जुड़ी एक गुप्त एयरलाइन थी. यह अमेरिका समर्थित हमोंग सैनिकों और जरूरी सामान को लाओस की पहाड़ी हवाई पट्टियों तक पहुंचाती थी. इन हवाई पट्टियों को लीमा साइट्स कहा जाता था. इतिहासकार डॉ. जोआचिम लीकर के मुताबिक, 1968 में बान केउन से एयर अमेरिका के हेलीकॉप्टर हमोंग सैनिकों को लड़ाई वाले इलाकों तक पहुंचाते थे.
करीब छह दशक बाद अब उसी जगह पर चीन और लाओस का नया मिलिट्री सेंटर विकसित हो रहा है. यही वजह है कि इस छोटे से एयरफील्ड पर अब दक्षिण-पूर्व एशिया की बड़ी शक्तियों और सुरक्षा विशेषज्ञों की नजर है.















