मुजफ्फरनगर। नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग योजनान्तर्गत कृषि विज्ञान केन्द्र, चितौड़ा पर वित्तीय वर्ष 2025-26 का पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम 6, 7, 9, 10 एवं 11 फरवरी 2025 को सफलतापूर्वक आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण में क्लस्टर स्तर पर चयनित कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन (CRP) ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का उद्देश्य प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना तथा सीआरपी को नवीन कृषि तकनीकों से अवगत कराना था, ताकि वे अपने–अपने क्षेत्रों में किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति प्रेरित कर सकें और व्यवहारिक मार्गदर्शन दे सकें।प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को प्राकृतिक खेती से संबंधित विभिन्न महत्वपूर्ण घटकों जैसे जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र एवं अग्निआस्त्र को तैयार करने की विधि, उनकी उपयोगिता, प्रयोग का समय तथा फसलों में उनके प्रभाव के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि इन जैविक घोलों एवं प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से फसलों की गुणवत्ता में सुधार होता है, लागत घटती है और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।कार्यक्रम में उपस्थित अधिकारियों एवं कृषि वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक खेती की उन्नत तकनीकों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उप कृषि निदेशक प्रमोद सिरोही ने सीआरपी को संबोधित करते हुए प्राकृतिक खेती को जन–जन तक पहुंचाने का आह्वान किया। उन्होंने कृषि विभाग द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी और बताया कि सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने जीवामृत और बीजामृत के प्रयोग से होने वाले लाभों पर भी विशेष जोर दिया।कृषि विज्ञान केन्द्र, चितौड़ा के प्रभारी अधिकारी डॉ. यशपाल सिंह ने गन्ना, सरसों एवं अन्य प्रमुख फसलों को प्राकृतिक विधि से उगाने की तकनीकों पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उत्पादन लागत में कमी आती है और पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. पूजा ने प्राकृतिक विधि से उगाई गई गन्ना एवं गेहूं की फसलों में रोगों की रोकथाम के उपायों पर प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों को रासायनिक दवाओं के स्थान पर जैविक विकल्प अपनाने की सलाह दी।प्रक्षेत्र प्रबंधक डॉ. संजीव कुमार ने प्राकृतिक खेती कब, क्यों और कैसे करनी चाहिए, इस विषय पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि बदलते पर्यावरणीय परिदृश्य में प्राकृतिक खेती एक टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रही है। वहीं कृषि वैज्ञानिक डॉ. रीना ने जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र एवं अग्निआस्त्र तैयार करने की व्यावहारिक प्रक्रिया समझाई तथा प्राकृतिक विधि से गन्ना एवं गेहूं की फसलों में रोग नियंत्रण के उपाय बताए।पाँच दिवसीय द्वितीय प्रशिक्षण के सफल समापन पर सभी प्रतिभागी सीआरपी को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। अंत में उप कृषि निदेशक द्वारा सीआरपी की प्राकृतिक खेती से संबंधित समस्याओं का समाधान किया गया तथा प्रशिक्षण में सहयोग देने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम का समापन किया गया। यह प्रशिक्षण प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।















