नई दिल्ली। मातृत्व अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए Supreme Court of India ने कहा है कि बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को भी मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) का अधिकार मिलना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि मातृत्व संरक्षण एक मौलिक मानवाधिकार है और इसे बच्चे के जन्म के तरीके के आधार पर छीना नहीं जा सकता। कोर्ट ने कहा कि चाहे बच्चा प्राकृतिक रूप से जन्मा हो, सरोगेसी से हुआ हो या गोद लिया गया हो, हर स्थिति में मां और बच्चे के बीच शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है, इसलिए मातृत्व अवकाश का लाभ सभी महिलाओं को समान रूप से मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मातृत्व केवल जैविक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है। गोद लेने वाली मां को भी बच्चे के साथ शुरुआती समय बिताने, उसकी देखभाल करने और उसके साथ भावनात्मक संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य केवल प्रसव के बाद महिला के स्वास्थ्य की सुरक्षा नहीं है, बल्कि बच्चे के समुचित पालन-पोषण और विकास को सुनिश्चित करना भी है। ऐसे में गोद लेने वाली महिलाओं को इस अधिकार से वंचित रखना संविधान की भावना के विपरीत होगा।
कोर्ट ने कहा कि कार्यस्थलों पर महिलाओं को समान अवसर और सम्मानजनक माहौल देना सरकार और संस्थानों की जिम्मेदारी है। मातृत्व अवकाश महिलाओं को परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाने में मदद करता है। इसलिए नीतियों और नियमों में ऐसा कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए जो किसी महिला को केवल इसलिए मातृत्व लाभ से वंचित कर दे क्योंकि उसने बच्चे को जन्म नहीं दिया, बल्कि उसे गोद लिया है।
इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और बाल संरक्षण के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय देश में दत्तक ग्रहण को भी बढ़ावा देगा और गोद लिए गए बच्चों के बेहतर पालन-पोषण में मदद करेगा। साथ ही यह फैसला कार्यस्थलों पर लैंगिक समानता को मजबूत करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मातृत्व का सम्मान करना समाज और व्यवस्था दोनों की जिम्मेदारी है और किसी भी महिला को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।















