बिना शराब पिए भी चढ़ रहा है नशा? जानिए क्या है ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम,

क्या आप जानते हैं कुछ दुर्लभ मामलों में शरीर में ऐसी स्थिति बनने लगती है, जब व्यक्ति बिना शराब पिए भी नशा में रहने लगता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम Auto-brewery  syndrome (ABS) एक ऐसी गंभीर बीमारी है, जिसमें शरीर के अंदर ही अल्कोहल बनने लगता है. आइए Asian Journal Research से जानें क्या है ये बीमारी और शरीर पर कैसा असर डालती है?

शराब पीना सेहत के लिए बहुत नुकसानदायक होता है, इससे न सिर्फ नशा होता है, बल्कि गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. लेकिन क्या हो अगर शराब आपके अंदर ही बनने लगे? ये सुनकर आपको हैरानी हो सकती है, लेकिन साइंस की दुनिया में एक स्थिति ऐसी है, जिसमें शरीर के अंदर ही अल्कोहल बनने लगता है और व्यक्ति बिना शराब पिए भी नशे में रहता है. इस स्थिति को मेडिकल भाषा में ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम कहा जाता है. आइए इस स्टोरी में जानते हैं क्या है ये स्थिति और कैसे शरीर में खुद बनने लगता है अल्कोहल?

क्या है ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम Auto-brewery  syndrome  (ABS)

Asian Journal Research के अनुसार, ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम (Auto-Brewery Syndrome) एक दुर्लभ और बहुत कमरिपोर्ट होने वाली मेडिकल स्थिति है, जिसे गट फर्मेंटेशन सिंड्रोम या एंडोजेनस इथेनॉल फर्मेंटेशन भी कहा जाता है. इस स्थिति में आंतों में मौजूद कुछ फंगस या यीस्ट जैसे सूक्ष्मजीव कार्बोहाइड्रेट को फर्मेंट करके शरीर के अंदर ही अल्कोहल (इथेनॉल) बना सकते हैं. इससे व्यक्ति को बिना शराब पिए नशे जैसा महसूस हो सकता है. इस समस्या में व्यक्ति वैसी ही हरकत करता है, जैसा शराब पीने के बाद अक्सर देखी जाती है, जिसमें, चक्कर, लड़खड़ाहट और व्यवहार में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. अगर कोई व्यक्ति शराब का सेवन नहीं कर रहा है, लेकिन उसके बाद भी उसे शराब के नशे की तरह महसूस हो रहा है, तो बेहतर रहेगा कि इसे बीपी की समस्या न समझकर तुरंत डॉक्टर से जांच कराया जाए.

गट फ्लोरा पर ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम का असर

जानकारी के अनुसार, गट फ्लोरा (Gut Flora) हमारी आंतों में रहने वाले सूक्ष्मजीवों, बैक्टीरिया, और कवक का एक समूह है, जो पाचन और समग्र स्वास्थ्य में मदद करता है. इसे ‘गट माइक्रोबायोटा’ या आंतों की सूक्ष्मवनस्पति भी कहा जाता है. ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम का इसपर कई तरह से असर पड़ता है.

  • गट फ्लोरा पर ऑटो-ब्रूअरी के असर को ‘डिस्बायोसिस’ (Dysbiosis) कहा जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम अक्सर गट फ्लोरा में असंतुलन से जुड़ा होता है, जिससे पेट फूलना, पेट दर्द और दस्त जैसे कई लक्षण हो सकते हैं.
  • फर्मेंटेशन करने वाले माइक्रोऑर्गेनिज्म (सूक्ष्मजीवों) का बहुत ज्यादा बढ़ना; जब ऐसा होता है, तो इससे फर्मेंटेशन करने वाले माइक्रोऑर्गेनिज्म – जैसे कि कैंडिडा (Candida) या सैकरोमाइसेस सेरेविसिया (Saccharomyces cerevisiae) और भी ज्यादा बढ़ सकते हैं, जिससे इथेनॉल का उत्पादन और बढ़ सकता है.

लिवर पर असर: ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम की स्थिति में लिवर पर भारी दबाव पड़ता है. इस स्थिति के कारण लिवर को जरूरत से ज्यादा काम करना पड़ता है. आम तौर पर लिवर इथेनॉल को मेटाबोलाइज करने का काम करता है, और ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम वाले लोगों में, लिवर को ज्यादा मात्रा में इथेनॉल का सामना करना पड़ सकता है. इतना ही नहीं, इस स्थिति के कारण लिवर में सूजन, लिवर डैमेज, धीरे-धीरे खराब होना, निशान पड़ना. सिरोसिस आदि कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

दिमाग और नसों पर असर: खून में अल्कोहल का लेवल बढ़ने से न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं, जैसे चक्कर आना, उलझन और सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ना.

अन्य असर: इसके अलावा इस ऑटो-ब्रूअरी सिंड्रोम के कारण दिल से जुड़ी बीमारियों, इम्यूनिटी आदि से जुड़ी बीमारियों का भी खतरा बढ़ सकता है.

 

 

 

 

अस्वीकरण – इस खबर को सामान्य जानकारी के तौर पर लिखा गया है. अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें या चिकित्सक से परामर्श करें.

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