तानों से लेकर एशियन गेम्स के मेडल तक, पारुल चौधरी की कहानी

एशियन गेम्स में तेजी से दौड़ रही पारुल के पास बस 30 मीटर का फासला बचा था. उसके आगे कुछ प्रतिद्वंदी थे. तभी उसे याद आया कि यदि वह एशियन गेम्स में गोल्ड जीत जाती है तो उसे उत्तर प्रदेश सरकार सीधे डीवाईएसपी बना देगी. बस फिर क्या.. उन्होंने पूरी ताकत लगायी और एशियन गेम्स में गोल्ड हासिल किया. इस बार के एशियन गेम्स में पारुल को ब्रांज से संतोष करना पड़ा. जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स-2026 में देश के लिए दो मेडल जीतने वाली पारुल चौधरी का गृह जनपद पहुंचने पर भव्य स्वागत हुआ. पारुल चौधरी महिला वर्ग में देश की एकमात्र ऐसी खिलाड़ी हैं, जिन्होंने लगाता दूसरी बार एशियाड में दो अलग-अलग प्रतियोगिताओं में मेडल जीते हैं. एशियन गेम्स-2026 प्रतियोगिता में भारत को दो मेडल दिलाने वाली देश की महिला एथलीट जापान से भारत लौटीं. जब वह मेरठ अपने घर एकलौते के लिए आ रही थीं, तो परिवार के सदस्यों और उनके प्रसंशकों ने काशी टोल प्लाजा पर उनका भव्य स्वागत किया.

पारुल चौधरी ने महिलाओं की 3000 मीटर स्टीपलचेज स्पर्धा में, इस बार राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाया है. वहीं अपने ही पुराने रिकॉर्ड को तोड़कर 9:08.67 मिनट में स्पर्धा में कांस्य पदक अपने नाम किया है. स्टीपल चेज प्रतियोगिता में 2023 में पारुल ने सिल्वर मेडल जीता था. वहीं, इस बार 5000 मीटर रेस में भी पारुल चौधरी ने कांस्य पदक हासिल किया था. जबकि 2023 में एशियन गेम्स में इस प्रतियोगिता में पारुल ने गोल्ड जीता था. पारुल के पिता कृष्णपाल ने टीवी9 भारतवर्ष से कहा कि हर खिलाड़ी का दिन होता है, उनकी बेटी पर उन्हें गर्व है.

बचपन में त्यागी जी ने सिखाया

पारुल के कोच अभिनव त्यागी ने बताया कि जब कक्षा 8 में थी तभी वह मेरठ के स्टेडियम में प्रैक्टिस के लिए आयी थी. उस समय ग्रास कोर्ट था, उसपर प्रैक्टिस करके पारुल ने वह मुकाम हासिल किया जिसपर देश को गर्व है. उन्होंने कहा कि अब यह ट्रैक सिथेटिक का हो गया है. यहां प्रैक्टिस करने वाले हर बच्चे के लिए पारुल नजीर है.

बहुत मुश्किल था पारुल का सफर

पारुल ने बताया कि उनके घऱ से स्टेडियम की दुरी लगभग 15 किलोमीटर है. घर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी. ऐसे में गांव से हाईवे तीन किलोमीटर पैदल जाती थी. वहां से आटो लेकर स्टेडियम तक जाती थी. पारुल ने कहा कि स्टेडियम से लौटते समय पिताजी हाईवे पर साइकिल लेकर इंतजार करते थे.

शादी हो जाए इसलिए स्पोर्ट्स में भेजा

कृष्णपाल ने कहा कि जब यह 8वीं कक्षा में थी तभी खेल के प्रति इसका लगाव उन्हें दिखा. घर की माली हालत ठीक नहीं थी ऐसे में उन्होंने सोचा कि यदि स्टेट भी पारुल खेल लेती है तो स्पोर्ट्स कोटे से कम से कम पुलिस में तो नौकरी हो ही जाएगी. ऐसे में शादी करवाने के खर्चे से कम से कम वह बच जाएंग. उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता था कि ऐसा भी दिन आएगा जब राज्य नहीं बल्कि नेशनल और इंटरनेशनल भी खेलेगी..

आंसू आ गए एयरपोर्ट पर

पिता कृष्णपाल ने कहा कि जब वह एयरपोर्ट पर पहुंचे और अपनी बेटी को आते देखा मेडल के साथ तो उनके आंखों में आंसू थे. उन्होंने कहा कि ये किसी सपने के हकीकत में तब्दील होने जैसा था. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था. जहां बधाई देने वालों का तांता लगा था.

मां की मेहनत काम आयी

पारुल की मां राजेश देवी ने कहा कि वो सुबह चार बजे उठ जाती थी. उसके बाद वह तैयार होकर स्टेडियम के लिए निकल जाती थी. इसके बाद वहां से आकर फिर स्कूल जाती थी. दोपहर का खाना खाकर फिर स्टेडियम जाती थी. यह कठिन तपस्या थी जिसने पारुल को गोल्डन गर्ल बनाया.

बड़ी बहन भी हैं खिलाड़ी

पारुल की बड़ी बहन प्रिती भी एथलेटिक्स हैं. उन्हें स्पोर्टस् कोटे पर सीआईएसएफ में नौकरी मिली है. उन्होंने भी राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर मेडल लिया है. फिलहाल, वह सीआईएसएफ के लिए खेल रही हैं. उन्होंने कहा कि पारुल की मेहनत ही उसका सबकुछ है. संघर्ष के दिनों को याद करके वह बताती है कि किस तरह से दोनों बहनें घर से स्टेडियम जाया करती थी.

भाई ने कहा कि मेहनत काम आयी

रोहित चौधरी पेशे से किसान हैं.. उन्होंने टीवी9 भारतवर्ष से बातचीत में बताया कि उनकी बहन बहुत ही लगनशील है.. कभी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.. एक बार जब घर से निकली उसके बाद मेडल लेकर ही वापस आयी…पूरा घर उनकी सफलता की कामना कर रहा था..

भाभी को है गर्व

पारुल की भाभी ने कहा कि उन्हें अपनी ननद पर गर्व है, जिस तरह से उन्होंने देश का नाम रौशन किया है वह उनके गांव परिवार और सभी कि लिए गौरवान्वित करने वाला पल है. जिस समय वह खेल रही थी उस समय पूरा परिवार सांस थामे उन्हें देख रहा था. उन्होंने कहा कि उनका बेटा ईश्वर की तस्वीर हाथ में थामे रखा था.

खेल को कोटे

पारुल चौधरी ने कहा कि वर्तमान युवाओं को खेलों में आगे बढ़ने के समान अवसर दे रही है. केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से खिलाड़ियों के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी सराहना उन्होंने की. पारुल चौधरी ने कहा कि वह यही कहेंगी कि ज्यादा से ज्यादा बेटियां आगे आएं. मेहनत करें और अपने गांव समाज, देश का नाम रोशन करें.पारुल चौधरी को यूपी सरकार ने डिप्टी एसपी बनाया था. वहीं, भारत सरकार ने उन्हें अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया था. पारुल चौधरी के पूर्व कोच रहे गौरव त्यागी ने कहा कि आज का दिन सभी के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज पारुल वापस लौटी है और सभी उनकी इस सफलता से खुश हैं. अधिकारी जितेंद्र यादव ने कहा कि यह पूरे जिले के लिए गर्व की बात है कि यहां की बेटी ने एशियन गेम्स में अपनी प्रतिभा दोबारा दिखाई और फिर दो मेडल जीतकर लौटी हैं. उनमें भविष्य के लिए भी तमाम सम्भावनाएं हैं. ऐसी बेटी पर पूरे देश को गर्व है.वह तड़के चार बजे पगडंडियों पर दौड़ लगाती थी तो कुछ लोग कृष्णपाल पर व्यंग्य कसते हुए कहते थे-‘क्या बेटियों को फौज में भर्ती कराएगा, जो उन्हें दौड़ा रहा है.’ पिता ये ताने सुनकर चुप रह जाते, लेकिन बेटी लगातार दौड़ती रही.

पारुल का मेडल से जवाब

आखिरकार, गांव की मिट्टी से निकली पारुल ने पदक जीतकर न सिर्फ देश का मान बढ़ाया बल्कि उन तानों का जवाब भी दे दिया, जिन्हें बेटी का दौड़ना शर्मनाक लगता था, आज वहीं उनकी उपलब्धि पर नाज कर रहे हैं. पारुल की दोहरी उपलब्धि से उनके गांव से लेकर शहर के कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम के धावकों में खुशी है.

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